तो इस लिए महत्मा गाँधी को नहीं दिया गया भारत रत्न और नोबेल पुरष्कार.

Nanhe Sipahi | Sep 05, 2017 02:09 PM


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अगर आपको ये पता चले की स्वतंत्र भारत के इतिहास में महात्मा गाँधी के नाम पर सड़कें, विश्वविद्यालय, सरकारी भवन तो बनाये गए पर उन्हें कभी भारत रत्न नहीं दिया गया यहाँ तक की ५ बार उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरष्कार के लिए नामित तो किया गया पर उन्हें ये पुरष्कार कभी दिया नहीं गया तो हो सकता है कि आपको अचरज हो, पर ये सच है महात्मा गाँधी को नहीं कभी भारत रत्न मिला न ही उन्हें कभी नोबेल परुष्कार के नवाज़ा गया.

भारत रत्न नहीं दिए जाने का ये है कारण



भारत रत्न न दिए जाने के पीछे बहुत सरे तर्क उपलब्ध है उनमें से एक है मरणोपरांत ये पुरष्कार न दिया जाना. भारत रत्न की शुरुआत १९५४ में की गयी थी, गाँधी की हत्या १९४८ में ही हो गयी थी. बाद में इस पुरस्कार के नियमो में बदलाव किया गया और निर्णय किया गया की मरणोपरांत भी ये पुरष्कार दिया जा सकता है. लाल बहादुर शास्त्री मरणोपरांत भारत रत्न पाने वाले पहले व्यक्ति थे.
इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं डाली गयी और इन सारी याचिकाओं को कोर्ट ने खारिज कर दिया. कोर्ट के अनुसार भारत रत्न देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है और ये पुरष्कार महात्मा गाँधी को देना उनके योगदान को कम कर के आंकने जैसा है. ये लगभग ऐसा है जैसे एक PHD को दसवीं का सर्टिफिकेट देना.
वैसे भी देश में भारत रत्न देना राजनीत का एक हिस्सा है और जहां जिनसे फायदा होता है उसे भारत रत्न दिया जाता है, ऐसे में गाँधी को भारत रत्न देना उनके सम्मान को कम करने जैसा होगा.


इस कारण से नहीं दिया गया नोवेल



महात्मा गांधी को 1937, 1938, 1939, 1947 में नोबेल प्राइज के लिए नामित किया गया था और आखिरकार 1948 में उनकी हत्या के कुछ दिनों पहले भी महत्मा गाँधी को नोबेल पुरष्कार के लिए नॉमिनेशन मिला था. हालाँकि इस पुरष्कार से विश्व शांति के सबसे बड़े पुरोधा सदा अछूते ही रहे. बाद में नोबल पुरष्कार कि कमिटी ने सार्वजनिक तौर पर इसके लिए खेद भी व्यक्त किया था. जब 1989 में दलाई लामा को शांति के लिए नोबेल पीस प्राइज दिया गया था तब नोबेल कमिटी के अध्यक्ष ने गाँधी के सम्मान में कहा था "in part a tribute to the memory of Mahatma Gandhi". हालाँकि इस कमिटी और अन्य दूसरी कमिटियों ने ये कभी नहीं बताया की ऐसा क्यों किया गया. हाल के कुछ दिनों में ऐसे साक्ष्य उपलब्ध कराये गए है जिससे पता चलता है की गाँधी को नज़रअंदाज़ करने की वजहें बहुत खास थीं.


तथ्यों से पता चलता है की 1960 तक इस पुरष्कार पर मुख्यतः यूरोप और अमेरिका का ही वर्चस्व रहा इससे पता चलता है ६० के दशक तक नॉर्वे की नोबेल कमिटी का क्षितिज बहुत ही संक्रिण था. उपलभ्ध कराये गए तथ्यों से पता चलता है की नोबेल कमिटी गाँधी को दूसरे पुरष्कार विजेताओं से अलग मानती थी. गाँधी को नोबेल कमिटी न ही कोई राजनीतिज्ञ मानती थी न ही ऐसा व्यक्ति मानती थी जिसने दुनिया को कोई नयी चीज़ दिया था . गाँधी न तो किसी अंतराष्ट्रीय कानून के समर्थक थे न ही गाँधी अंतरराष्ट्रीय शांति परिषदों के आयोजक ही थे. वस्तुतः नोबेल कमिटी के अनुसार महात्मा गाँधी न मानवाधिकार की ही लड़ाई लड़ रहे थे. नोबेल कमिटी के अनुसार अगर उनको ये पुरष्कार दिया भी जाता तो तो एक नए तरह की केटेगरी की जरुरत पड़ती.

कुछ लोगो का ऐसा भी मानना है की चुकी नॉर्वे की नोबेल कमिटी गाँधी को पुरष्कार देकर ब्रिटिशर्स का दंश नहीं झेलना चाहती थी इस लिए भी गाँधी को ये पुरष्कार नहीं दिया गया. हलाकि इस बात को साबित करने के पुख्ता प्रमाण नहीं है.

एक तथ्य ये भी है भारत पाकिस्तान बटवारे के समय गाँधी का अनसन पर बैठने के बाद के कुछ वक्तव्य ऐसे है जिससे नोबेल कमिटी को लगा की महत्मा शांति का रास्ता छोड़ने वाले है, हालाँकि उनकी ये सोच गलत साबित हुई. आज की स्थिति के विपरीत, क्षेत्रीय संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में शांति पुरस्कार का उपयोग करने की कोशिश करने के लिए नार्वे की नोबेल समिति की तब ऐसे कोई परंपरा नहीं थी.

अपने जीवन के आखिरी महीनों के दौरान, गांधी ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हुई हिंसा को समाप्त करने के लिए कड़ी मेहनत की, जो भारत पाकिस्तान के बटवारे के बाद शुरू हुए थे. 1948 में गांधी की उम्मीदवारी पर नॉर्वेजियन नोबेल समिति की चर्चाओं के बारे में हम ज्यादा कुछ नहीं जानते .(18 नवंबर को गुनार जहान की डायरी में उपरोक्त उद्धृत प्रविष्टि के अलावा ). पर इतना स्पष्ट है की मरणोपरांत उन्हें नोबेल देने पर भी विचार किया गया था, पर ऑपचारिक कारणों से कमिटी ने ये पुरष्कार नहीं दिया. और १९४८ में इस पुरष्कार को भी सुरक्षित कर लिया गया और पुरष्कार की धनराशि खर्च नहीं करने का फैसला भी लिया गया.


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