खुदी राम बोस सचमुच एक संघर्ष की कहानी है

Kirti Mishra | Aug 08, 2017 11:08 AM


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एक महान क्रन्तिकारी खुदी राम बोस जिनका जन्म बंगाल के हबीबपुर के एक छोटे से गांव मिदनापुर में 3 दिसंबर 1889 में हुआ था । इनकी पिता का नाम त्रिलोकनाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था । खुदीराम अपने परिवार में सबसे छोटे थे ,उनकी 3 बड़ी बहने थी । उनकी दो भाइयों की मृत्यु जन्म के साथ की हो गयी थी । इस वजह से उनकी माँ बहुत डरती थी की कहीं वो अपने बेटे को खो न दे । इस कारण उन्होंने अपने बेटे की रक्षा के लिए अंधविश्वास का सहारा लिया । अंधविश्वास के कारण उनकी माँ ने उनको अपनी बड़ी बेटी को खादान के रूप में बेच दिया । जिसे खुद कहते हैं । इसी कारण उनकी माता का अपने बेटे पर से सारे अधिकार चले गए थे । इसी कारण उनका नाम खुदी राम पड़ा था । क्योंकि उन्होंने खुद की जान के पहले खुद को सौप दिया था.
 
क्रांति के रस्ते में प्रेरणा 
                                       
जन्म से ही खुदीराम काफी निडर प्रतीत होते थे । उनके चहरे पर एक तेज था । वो जोखिम से भरे कामों को बहुत ही बखूबी अंजाम तक पहुंचाते थे । 1902 में वो आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे थे ।इस दौरान डॉ अरविंदो और सिस्टर निवेदिता भाषण देने के लिए मिदनापुर आये हुए थे ।खुदीराम उस समय नया खून थे और उन दिनों अंग्रेज़ो के प्रति जो गुस्सा आम भारतियों में पनप रहा था, खुदी राम उसका एक बहुत बड़ा नमूना थे | इस भाषण से उनको बहुत ही प्रेरणा मिली और अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त योजना सत्र में भी उन्होंने भाग लिया ।1904 में वो तमलुक से मिदनापुर के मुख्य शहर में चले गए और वहां जा कर उन्होंने स्कूल में दाखिला लिया । यहां वो शहीद क्लब के सक्रिय सदस्य बन गए थे और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगे । अरविन्द और सिस्टर निवेदिता के अलावा वो भगवतगीता और उनके गुरु सतेंद्रनाथ बोस से भी प्रभावित थे ।

बंगाल के विभाजन के समय खुदीराम बोस एक क्रांतिकारी दल जुगन्दर से भी जुड़ गए थे । कुछ समयबाद उन्होंने मेदनीपुर के पुलिस छावनी में बम भी गिराए थे पर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सका था । बाद में लगभग तीन वर्षो के अंतराल के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाये गयी थी ।


                                  
मुज्जफ्फरपुर हत्याकांड 
                                               
कलकत्ता के मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को मारने के लिए खुदी राम और प्रफुल्ल चाकी का चयन किया गया था । उन्दोनो को हथियार स्वरूफ एक बम और एक पिस्टल दी गयी थी ।वो दोनों मज्जफरपुर चले गए और वहां जा कर नाम बदल के रहने लगे । कहा जाता है कि उन्होंने अपना नाम बदल कर हरेन सरकार और दिनेश रॉय रखा था। मुजफरपुर में वो किशोरीमोहन की धर्मशाला में रहने लगे और वही से किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाने लगे । क्यों कि वो निर्दोष लोगो को नहीं मारना चाहते थे इसलिए उस समय का इंतज़ार करने लगे जब किंग्सफोर्ड अकेले दिखे । 30  अप्रैल 1908  को इन्हे सूचना मिली की किंग्सफोर्ड अकेले निकलने वाले है, खुदी राम और प्रफुल चाकी को इसी मौके की तलाश थी , खुदीराम और प्रफुल्ल यूरोपियन क्लब के बाहर  किंग्सफोर्ड के आने का इंतज़ार कर रहे थे। उस समय रात के 8:30 हो रहे थे ।तभी खुदीराम ने अँधेरे में आती एक बग्घी दिखाई दी, ये सोच कर की इसी बग्घी में किंग्सफोर्ड होगा, खुदी राम बोस ने बम फेंक दिया ।उन्हें लगा की उनका काम पूरा हो गया । पर बाद में पता चला की उसमे किंग्सफोर्ड थे ही नहीं बल्कि उसमे उनकी पत्नी और उनका बेटा था ये खबर जब खुदीराम को मिली तो वो बहुत ही दुखी हुए  । वो इधर उधर छुपते रहे । कुछ दिनों  के बाद उन्हें  के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । 

किंग्सफोर्ड को मारने में असफल होने के बाद पुलिस की नज़रो से बचने के लिए खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों ने अलग-अलग रास्तो पर जाने का निश्चय किया। उधर अलग रास्ते पर जाने के बाद प्रफुल्ल चाकी भी भाग-भाग कर भूक-प्यास से तड़प रहे थे।

1 मई को ही जब उनका साथीदार खुदीराम पकड़ा गया, प्रफुल्ल को मुजफ्फरपुर में ही बचने के लिए एक स्थानिक का घर मिल गया। उस आदमी ने उनकी मदद की और रात को ट्रेन में बिठाया पर रेल यात्रा के दौरान ब्रिटिश पुलिस में कार्यरत एक सब-इंस्पेक्टर को शक हो गया और उसने मुजफ्फरपुर पुलिस को इस बात की जानकारी दे दी।

जब प्रफुल्ल चाकी हावड़ा के लिए ट्रेन बदलने के लिए स्टेशन पर उतरे तब पुलिस पहले से ही वहा मौजूद थी। अंग्रेजो के हाथो मरने की बजाये चाकी ने खुद को गोली मार ली और शहीद हो गये।

                            

खुदीराम की गिरफ़्तारी 
                                         

ब्रिटिश अधिकारी खुदीराम बोस / Khudiram Bose को पकड़ने के लिए जगह-जगह तैनात किये गये थे। और साथ ही ब्रिटिश सरकार ने उनपर 1000 रुपयों का इनाम रखा। यह जानते हुए भी की पुलिस उनके पीछे पड़ी है। खुदीराम बोस ने मेदिनीपुर जाने का निर्णय किया।

ओयेनी में खुदीराम बीमार होने की वजह से एक ग्लास पानी पिने के लिए रुके। जैसे ही खुदीराम चाय की टपरी पर पानी पिने के लिए रुके उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। यह याद करने योग्य बात है की मुजफ्फरपुर की घटना के समय खुदीराम की आयु केवल 18 साल ही थी। सिर्फ 18 साल की उम्र में इतने बड़े कारनामे करना निश्चित ही एक चमत्कार के समान ही है।

1 मई 1908 को पुलिस ने उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया। जिस समय मुजफ्फरपुर के लोग स्टेशन खड़े होकर भावुक नज़रो से उस 18 साल के बच्चे को देख रहे थे उसी समय वह साहसी बच्चा (खुदीराम) “वन्दे मातरम” के नारे लगा रहा था।

खुदीराम बोस / Khudiram Bose को 2 मई 1908 को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया था और 21 मई को सुनवाई शुरू की गयी। बिनोदबिहारी मजुमदार और मन्नुक ब्रिटिश सरकार के गवाह थे जबकि उपेन्द्रनाथ सेन, कालिदास बसु और क्षेत्रनाथ बंदोपाध्याय, खुदीराम के बचाव में लढ रहे थे। नरेन्द्रनाथ लहिरी, सतीशचन्द्र चक्रवर्ती और कुलकमल भी खुदीराम के बचाव में आगे आये।

23 मई 1908 को खुदीराम ने कोर्ट में अपना पहला स्टेटमेंट दिया। अपने वकील की सलाह को मानते हुए खुदीराम ने हादसे में शामिल होने से इंकार कर दिया।

उनकी सुनवाई इसी तरह धीरे-धीरे चलती गयी और 13 जून को अंतिम सुनवाई की गयी। कहा जाता है की उनकी सुनवाई के दिन उनका बचाव करने वाले को एक पत्र मिला था जिसमे भविष्य में होने वाले बिहारियों और बंगालियों पर होने वाले बम ब्लास्ट के बारे में चेतावनी दी गयी थी। इस पत्र के मिलते ही बचाव पक्ष और भी कमजोर हो गया था और खुदीराम को मुजफ्फरपुर के बम ब्लास्ट में दोषी पाते हुए मृत्यु की सजा सुनाई गयी।

खुदीराम ने न्यायाधीश के इस निर्णय को बिना कोई विरोध किये मान लिया और अपने बचाव के लिए उच्च न्यायालय में अपील करने से भी मना कर दिया। उनके वकील ने जिन्होंने खुदीराम को अपील करने पर मजबूर किया था। ताकि वह अपने मातृभूमि की सेवा कर सके।

8 जुलाई 1908 को नरेन्द्रकुमार बसु जो खुदीराम के बचाव में लढ रहे थे उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील की। और इस अपील के साथ ही खुदीराम पुरे भारत में एक महान क्रांतिकारी बन गये थे। जिनके बचाव में पूरा देश आ चूका था।

13 जुलाई को मुजफ्फरपुर में हुई घटना पर पुनः सुनवाई की गयी और उच्च न्यायालय ने इस समय नरेन्द्रकुमार बसु की बातो को सुनते हुए खुदीराम बोस को जीवनदान दिया। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने पहले से ही तय कर रखा था की वह किसी भी हालत में खुदीराम को म्रुत्यु की सजा ही देंगे।

इतने बड़े हादसे का यह मुकदमा केवल पांच दिन चला। जून 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मृत्यु की सजा सुनाई गयी। इतना संगीन मुकदमा और सिर्फ पांच दिन में समाप्त यह बात न्याय के इतिहास में एक मजाक बनी रहेंगी।

11 अगस्त 1908 को इस वीर क्रन्तिकारी को फांसी पर चढ़ा दिया गया। उन्होंने अपना जीवन देश की आज़ादी के लिए न्योछावर कर दिया। जब खुदीराम बोस शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम पुरे भारत में प्रसिद्ध हो गये थे। इनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। इसके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए कई देशभक्ति गीत रचे गये और इनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ।

खुदीराम मर कर भी अमर हुए और उन्होंने दूसरो को भी इसी तरह अमर होने की प्रेरणा दी। थोड़े ही समय में हजारो स्त्री-पुरुषो ने खुदीराम के मार्ग पर चलते हुए भारत में अंग्रेजो की सत्ता नष्ट कर दी। जहा बाद में अंग्रेजो को भारत छोड़ना ही पड़ा।


एक नजर में खुदीराम बोस का इतिहास – Khudiram Bose History
  • 1889 – खुदीराम का जन्म 3 दिसम्बर को हुआ।
  • 1904 – वह तामलुक से मेदिनीपुर चले गये और क्रांतिकारी अभियान में हिस्सा लिया।
  • 1905 – वह राजनैतिक पार्टी जुगांतर में शामिल हुए।
  • 1905 – ब्रिटिश सरकारी अफसरों को मारने के लिए पुलिस स्टेशन के बाहर बम ब्लास्ट।
  • 1908 – 30 अप्रैल को मुजफ्फरपुर हादसे में शामिल हुए।
  • 1908 – हादसे में लोगो को मारने की वजह से 1 मई को उन्हें गिरफ्तार किया गया।
  • 1908 – हादसे में उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने खुद को गोली मारी और शहीद हुए।
  • 1908 – खुदीराम के मुक़दमे की शुरुवात 21 मई से की गयी।
  • 1908 – 23 मई को खुदीराम ने कोर्ट में अपना पहला स्टेटमेंट दिया।
  • 1908 – 13 जुलाई को फैसले की तारीख घोषित किया गया।
  • 1908 – 8 जुलाई को मुकदमा शुरू किया गया।
  • 1908 – 13 जुलाई को अंतिम सुनवाई की गयी।
  • 1908 – खुदीराम के बचाव में उच्च न्यायालय में अपील की गयी।
  • 1908 – खुदीराम बोस को 11 अगस्त को फांसी दी गयी।

खुदीराम बोस – Khudiram Bose को आज भी सिर्फ बंगाल में ही नही बल्कि पुरे भारत में याद किया जाता है। उनके युवाशक्ति की आज भी मिसाले दी जाती है। भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में अनेक कम आयु के वीरो ने भी अपने प्राणों की आहुति दी है। उनमे खुदीराम बोस का नाम स्वर्णक्षरो में लिखा जाता है।

उन्हें ‘स्वाधीनता संघर्ष का महानायक’ भी कहा जाता है। निश्चित ही जब-जब भारतीय आज़ादी के संघर्ष की बात की जाएँगी तब-तब खुदीराम बोस का नाम गर्व से लिया जायेंगा।

धन्य है वह धरती जिसने इस महापुरुष को जन्म दिया।



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