स्वतंत्रता संग्राम के पहले नायक: मंगल पांडे

Nanhe Sipahi | Jul 19, 2017 03:07 PM


News Image
१५ अगस्त की प्राचीर से जब जब कोई प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित करते हैं तब तब देश उल्लास में होता है, सही मायनो में स्वंतंत्रता दिवस देश पर्व ही तो है, पूरा देश एक रंग एक ढंग में होता है शायद ही ऐसा कोई भारतीय होगा जिसने इस देश पर्व पर उत्सव नहीं मनाया होगा. १५ अगस्त की आजादी हांसिल करने में कितने ही प्राणो की आहुति दी गयी, कितने लोग ने सड़को पर गलियों में नारे लगाए भूख हड़ताल किया. कितने लाठियां और गोलियां खाने के बाद देश की आज़ादी का यज्ञ सम्पन्न हुआ. लेकिन इस यज्ञ की पहली आहुति देने वालो को देश कैसे भूल सकता है. मंगल पांडेय के नाम के बगैर भारत के स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत नहीं होती.ईस्ट इंडिया कंपनी का वह भारतीय सिपाही अगर उस दिन कुछ नहीं करता तो 15 अगस्त, 1947 की वह सुबह आजादी की गवाह न बन पाती। आज देश उनका जन्मदिन माना रहा है. ऐसी मौके पर मंगल पांडेय से जुडी कुछ खास बातें हमें जरूर जाननी चाहिए.



१९ जुलाई १८२७ को उत्तरप्रदेश के बलिया में जन्में मंगल पांडेय ईस्ट इंडिया कंपनी के ३४वे रेजिमेंट के सिपाही थे. जब वो ईस्ट इंडिया कंपनी के बंगाल सेना में कार्यरत थे तब कंपनी ने ऐसी कारतूस मंगाए जिनका उपयोग दांतो से छील के किया जाता था. सिपाहियों में ये बात फ़ैल गयी थी की ये कारतूस गाय और सूअर की चर्बीयों से बनाये गए हैं. ब्राह्मण परिवार में जन्में मंगल पांडेय के लिए ये एक बड़ी बात थी. ऐसा करना हिन्दू धर्म के खिलाफ था. हिन्दुओं में गाय पवित्र होती है और मुस्लिमों में सुअर वर्जित। मंगल पांडे, जो कि एक ब्राह्मण परिवार से आते थे, उन्होंने उन कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। सैनिको में असंतोष की आग फ़ैल चुकी थी. ऎसे में २७ मार्च १८५७ में विरोध का बिगुल फूंक दिया गया. इतिहास में 29 मार्च 1857 से सम्बंधित कई दस्तावेज है. लोग ऐसा मानने लगे थे की ब्रिटिश हिन्दुओ और मुस्लिमो का धर्म भ्रष्ट करने में लगे हुए है. मंगल पांडे ने इसका बहोत विरोध किया. और इसके खिलाफ वे ब्रिटिश अधिकारियो के विरुद्ध उठ खड़े हुए. एक दिन जब नए कारतूस थल सेना को बाटे गये थे तब मंगल पांडे ने उसे लेने से इंकार कर दिया. इसके परिणामस्वरूप उनके हथियार छीन लिए जाने व वर्दी उतार लेने का हुक्म हुआ. मंगल पांडे ने ब्रिटिशो के इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया. और उनकी रायफल छिनने के लिए आगे बढे अंग्रेज अफसर पर उन्होंने आक्रमण कर दिया. मंगल पांडेय ने अपने सार्जेंट पर हमला बोल दिया.उन्होंने अपने बाकी साथियों को भी विद्रोह करने के लिए उकसाया। अपने साथियों के साथ मिलकर उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया, लेकिन आखिर में उन्हें घेर लिया गया।



मंगल पांडेय द्वारे शुरू किये गए इस विद्रोह को ब्रिटिश राज ने अपने विरुद्ध विद्रोह माना और ८ अप्रैल १८५७ को मंगल पांडेय को सजा-ए-मौत दे दी गयी. भले ही बर्तानिया ने मंगल पांडेय के मुखर स्वर को पूर्णविराम लगा दिया पर तब तक काफी देर हो चुकी. मंगल पांडेय की चिंगारी आग का रूप ले चुकी थी धीरे धीरे से विद्रोह फैलता गया. जिसे बर्तानिया को बाद में अमानवीय तरीके से कुचलना पड़ा.



भले ही मंगल पांडेय ने अपनी ये आवाज़ धर्म के नाम पर उठायी थी पर उनकी उस आवाज़ में इतनी शक्ति थी जिसने भारतीयों को बताया की ब्रिटिश राज के विरुद्ध भी स्वर उठाया जा सकता है और यही से भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम की आवाज़ मुखर होती है.


News Image

वो शख्स जिससे खौफ खाते थे अंग्रेज, जो हमेशा रहा ‘आजाद’, उसका नाम था 'चंद्रशेखर'

नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। 'अंग्रेज कभी मुझे जिंदा नहीं पकड़ सकेंगे'। यह कहना था शहीद चंद्रशेखर आजाद का। वो आजाद ...


News Image

हैप्पी बड्डे दूरदर्शन जी..

गर्मियों के छुट्टी में हम ''छुट्टी छुट्टी" देख कर बड़े हुए है, शक्तिमान और तहकीकात देखने के लिए घर में ...


News Image

बिहार के बारे क्या ये जानते हैं आप

बिहार की राजधानी पटना की बहुत सी बातें तो विश्व विख्यात हुई वही कुछ ऐसे बातें है तो अभी भी ...


News Image

तो इस लिए महत्मा गाँधी को नहीं दिया गया भारत रत्न और नोबेल पुरष्कार.

अगर आपको ये पता चले की स्वतंत्र भारत के इतिहास में महात्मा गाँधी के नाम पर सड़कें, विश्वविद्यालय, सरकारी भवन ...


News Image

महात्मा गाँधी से जुड़े ये तथ्य चौकाने वाले हैं

महात्मा गांधी अपने आदर्शों और अहिंसा के संदेश के चलते दुनिया भर में आज भी एक महान व्यक्ति के तौर ...


News Image

जिसने आडवाणी को रोका वो है आज मोदी का विशेष

बिहार के भूतपूर्व गृह सचिव अफजल अमानुल्ला ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 1990 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी ...