हैप्पी बड्डे दूरदर्शन जी..

Nanhe Sipahi | Sep 15, 2017 01:09 PM


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गर्मियों के छुट्टी में हम ''छुट्टी छुट्टी" देख कर बड़े हुए है, शक्तिमान और तहकीकात देखने के लिए घर में कई बार कुटाई भी हुई थी. ये गुजरे ज़माने की बात है. मन में श्रद्धा भले न थी पर मजाल की श्री कृष्णा का एक एपिसोड भी हमसे कोई छीन ले. शांति और स्वाभिमान उस समय हमारे मन में पला करते थे, आज की तरह नहीं की इंटरनेट और यूट्यूब पर हम उन्हें तलाशते फिरे. संडे तब रविवार हुआ करता था और रविवार का मतलब रंगोली भी होता था. शुक्रवार का चित्रहार तो आज भी मन में बस्ता है, शायद २ दिन आया करता था हफ्ते में. सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता था जब दिन भर के अख़बार के बाद पिता जी सोने से पहले न्यूज़ देखने लगते थे. बहुत सारे चैनेलो की सुविधाएं उस वक़्त नहीं थी एक प्रकार से अच्छा भी था.

तब न्यूज़ शोर नहीं हुआ करता था, खबर बस खबर हुआ करती थी और खबर सुनाने वाला बस खबर सुनाया करता था वो भी संवेदनशून्य होकर, आदेश फरमान सुनाना तब न्यूज़ एंकरों के बुते की बात नहीं थी. तब ये माना जाता था की केबल कनेक्शन लेने से बच्चे पढाई नहीं करेंगे, हाँ टोका फंसा के ज़ी टीवी कभी कभी देख लिया जाता था, अक्सर ये कुकृत्य रात में किया जाता था की कोई देख न ले, इस लिए ज़ी टीवी पर आहट ही देख पाए थे ज्यादा से ज्यादा.

तब की बात बहुत खास है, महाभारत देख कर धनुर्विद्या सिख ली थी. खुद के अर्जुन बनने पर कितनी बार लाठी चार्ज हुआ उसकी कोई गिनती नहीं है. इतवार की शाम ४ बजे कौन सी फिल्म आने वाली है इसमें ज्यादा रूचि थी, बड़ों की वाह में अपनी आह हुआ करती थी. ऐसा तब खास तौर पर हुआ करता था जब वो ४ बज की फिल्म राजकपूर के ज़माने की निकल जाये. क्रिकेट और दूरदर्शन का बहुत पुराना रिश्ता है. हमारे क्रिकेट देखने की शुरुआत दूरदर्शन से ही तो हुई है, आमिर सोहैल का वो विकेट जो वैंकटेश प्रसाद ने उखाड़ा था वो उस दौर में दूरदर्शन की ही देन थी. सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता था जब दूरदर्शन पर ७:१० पर प्रादेशिक समाचार और ८:३० पर राष्ट्रीय समाचार प्रसारित होने लगते थे मैच के बिच में. हालाँकि वो मैच के दिनों में आधे घंटे के न होकर १० मिनट के होते थे जो ये बताने के लिए काफी है कि खबरे तब भी बहुत काम हुआ करती थी.



(जिसने ये नहीं देखा उसने दूरदर्शन नहीं देखा )

केबल टीवी क्रन्ति से पहले दूरदर्शन ने टीवी पर राज किया .इसका कारण सिर्फ यह नहीं था कि दूरदर्शन एकमात्र चैनल था ,कारण यह भी था कि दूरदर्शन हर आयु-वर्ग का मनोरंजन करता था. दूरदर्शन पर सिर्फ रविवार को कार्टून आते थे . चूँकि भारत की एनीमेशन इंडस्ट्री उस समय विकसित नहीं थी इसलिए डिज्नी के कार्टून हिंदी में डब करके दिखाए जाते थे जैसे मोगली जंगल बुक, टेलस्पिन , डक टेल्स, अलादीन, ऐलिस इन वंडरलैंड आदि. “टर रम टू ” एक मजेदार कार्यक्रम था जिसका उद्देश्य मनोरंजन के साथ शिक्षा देने का था. मेरे सबसे प्रिय कार्टूनों में से एक का नाम था ‘वर्तमान‘ ,जोकि दोपहर में आया करता था . इस कार्टून में एनीमेशन बहुत सी औसत स्तर का हुआ करता था परन्तु कहानी ,पात्र और शिक्षा बेहतरीन होती थी. इन्टरनेट पर बहुत खोजने पर भी इसके विडियो नहीं मिल रहे मुझे. अगर किसी को पता हो तो कृपया लिंक बताने का कष्ट करें.




पोटली बाबा की कार्यक्रम में एक बूढा बाबा कहानियां सुनाते थे. बच्चों के लिए रोचक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम तरंग आता था जोकि सीआईईटी की तरफ से प्रायोजित हुआ करता था. तरंग का शुरुआती गाना हुआ करता था — सीआईईटी ले कर आया तरंग तरंग, उमंग है तरंग, पहेली पहली पहली है तरंग, मज़ा मज़ा मज़ा है तरंग—. लाल बुझक्कड़ चाचा, गोपू और गीतू के किरदार और उनकी सरल बातें हम मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों से मिलती हुई लगती थी.

हम सुराग और तहकीकात देख कर बड़े हुए, सीआईडी तब नहीं थी, हाँ व्योमकेश बक्शी जरूर आया करते थे और हम ये अनुमान लगाया करते थे की कलम में कोई ज़हर तो नहीं था. चरित्रहीन और चंद्रकांता जैसे बड़े उपन्यासों पर सीरियल्स बनते थे, आज के दौर की तरह नहीं था की साल भर बाद भी देखो तो "कुमकुम" का "भाग्य " खराब ही है.

कृषि दर्शन किसानो के ज्ञान और मार्गदर्शन का प्रोग्राम था जिस से शाम की शुरुआत होती थी . भले ही हमलोगों को इस सीरियल ने बोर किया हो परन्तु यह दूरदर्शन के सबसे सफल कार्यक्रमों में से एक था जिससे हजारों गांवों के लाखों किसानो का भला हुआ. इस कार्यक्रम के अंत में लोकगीत आते थे , जब वो आने लगता था तब मै राहत की सांस लेता था की चलो अब ख़तम होने वाला है . 

टर्निंग पॉइंट ज्ञान विज्ञानं से भरपूर कार्यक्रम होता था जिसमे गिरीश कर्नाड एंकर हुआ करते थे. पर्यावरण से सम्बंधित माइक पाण्डेय का कार्यक्रम ‘अर्थ मैटर्स ‘आता था . सिद्धार्थ काक और रेणुका शहाने ‘सुरभि ‘ में आते थे और एक साथ नमस्कार बोल कर कार्यक्रम शुरू करते थे . भारत की विभिन्न विविधताओं और अजब अनोखे रंगों को प्रदर्शित करने वाला यह कार्यक्रम बड़े-बच्चों सभी का स्वस्थ मनोरंजन करता था.




मेरे ख्याल में सुरभि पहला कार्यक्रम था जिसमे नियमित इनामी प्रतियोगिता होती थी. भारत के संस्कृति और सामान्य ज्ञान से सम्बंधित प्रश्न पूछे जाते थे और इनाम में भारत के विभिन्न राज्यों के टूर-पैकेज दिए जाते थे. एक एपिसोड में एक खेत सी जगह दिखाई गयी जहा मचान सा बाँध कर पौधे लगाये गए थे जिनकी बेलें उन मचानो से लटक रही थी. पूछा गया की ये किस चीज़ की खेती है जो की असल में पान की थी. उस एपिसोड में लाखों लोगों ने उत्तर भेजे जिनके पोस्टकार्ड अगले एपिसोड में दिखाया गया था ,उसे देखकर मुझे पहली बार अंदाजा लगा की सुरभि कितना लोकप्रिय सीरियल था.

ये जो है जिंदगी, मुंगेरीलाल के हसीं सपने, विक्रम-बेताल, रामायण, महाभारत, टीपू सुल्तान, अकबर द ग्रेट, व्योमकेश बक्शी, द ग्रेट मराठा, अंजुमन, सुराग, तहकीकात, संसार, मालगुडी डेज, तेनालीराम, बुनियाद, हम लोग, जय हनुमान, श्री कृष्णा, ॐ नमः शिवाय, कैप्टेन व्योम, चंद्रकांता, फ़र्ज़, वक़्त की रफ़्तार, अपराजिता, इतिहास, शांति, औरत, फरमान, देख भाई देख, एक से बढ़कर एक, ट्रक धिना धिन, भारत एक खोज, इंतज़ार और सही, चाणक्य, अलिफ़ लैला, आँखें, आपबीती, हम पंछी एक डाल के, फ्लॉप शो आदि ने हमारा मनोरंजन किया .  



हमारा बचपन विनी द पू , डक टेल्स, मिक्की माउस, सिन्दरला के कार्टून देख कर गुजरा है, मोगली तब चड्डी में हुआ करता था, आज के बचपन की तरह गैजेट का दौर नहीं था.  वो दूरदर्शन का दौर था. धन्यवाद् दूरदर्शन उन खट्टे मीठे पालो के लिए. हैप्पी बड्डे टू यू.


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