अरविन्द केजरीवाल - एक धूमिल होता ध्रुवतारा

Nanhe Sipahi | May 19, 2017 02:05 PM


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सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है की ये तस्वीर बदलनी चाहिए

कुछ सालो पहले हिंदुस्तान की राजनीतिक छितिज़ पर एक ध्रुवतारा प्रकाशमान हुआ और धीरे धीरे उसकी ख्याति बढ़ती गई, जैसे जैसे ये ध्रुवतारा आकाश की बुलंदियों को छूता गया वैसे वैसे कई आरोप, कई सवाल उसे घेरते गए. मौसम बदला, कई ऋतू आये गए , साल बदला , देश बदला और बदला बदला सा लगने लगा है ये ध्रुव तारा , हम बात कर रहे हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की.


आज जब देश का सबसे ईमानदार व्यक्तित्व का दंभ भरने वाले केजरीवाल विवादों में घिरे है जब उनपे भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं तो ये बिलकुल सही समय है ये विश्लेषण करने का कि कैसे राजनीत बदलने का वादा कर के सत्ता पे काबिज़ हुए केजरीवाल की छवि बदल गयी है |

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के पहले





१६ अगस्त 1968 को गोविन्द राम केजरीवाल के घर जन्मे अरविन्द केजरीवाल को जन्माष्टमी के दिन जनम लेने की वजह से घर वाले कान्हा कह कर बुलाते थे. 1989 में IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने वाले केजरीवाल ने जमशेदपुर में टाटा स्टील ज्वाइन किया और 1992 में टाटा स्टील छोड़ने के बाद सिविल परीक्षाओ की तैयारी की, बाद में उन्होंने IRS ज्वाइन किया.

अरविन्द की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब वो कोलकत्ता जा के मदर टेरेसा से मिले जहां मदर टेरेसा ने उन्हें कालीघाट आश्रम जाकर काम करने को कहा. 1995 में अरविन्द आयकर विभाग में जॉइंट कमिश्नर बन गए. सन 2000 में उन्होंने आयकर विभाग से 2 साल की छुट्टी ले ली , इस दौरान उन्होंने अपनी तन्खा नही ली या यूँ कहे की तन्खा नही दी गयी, इसी दौरान उन्होंने परिवर्तन नाम के NGO की स्थापना की . ये संस्था दिल्ली से काम करती थी और इसका उद्देश्य आयकर और बिजली विभाग में लोगों के रुके हुए कार्यों का जल्द से जल्द निपटारा करना था, इसके लिए उन्होंने दिल्ली में पर्चे भी बटवाये थे की अगर कोई अधिकारी आपसे पैसा मांगता है तो संस्था लोगो का काम मुफ्त में करवाएगी.



अरविन्द केजरीवाल चाहते थे की देश का सिस्टम बदले , उन्हें ऐसा लगा की सिस्टम बदलने के लिए सिस्टम के अंदर रहना बेहद जरुरी है इसके साथ ही उनकी महत्वाकांक्षा उन्हें दिल्ली से बाहर ले गयी , सन 2006 में अरविन्द ने आयकर विभाग से इस्तीफा दे दिया और पूरी तरह 'परिवर्तन' के हो लिए. अभी तक मनीष सिशोदिया परिवर्तन का चेहरा हुआ करते थे पर सन 2006 से 'परिवर्तन' की कमान पूर्णतः अरविन्द की हांथो में चली गयी . अरविन्द ने RTI को लेकर एक जागरूकता अभियान चलाया और इस दफा ये अभियान सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नही रहा. हलाकि ये सच है की केजरीवाल को RTI अभियान की लिए खासी सराहना मिली पर अभी भी आम आदमी तक इस उपकरण को पहुंचने में काफी समय लगेगा.



इंडिया अगेंस्ट करप्शन - जिसने बदल दी हिंदुस्तान की राजनीति



सन 2011, आज़ादी के बाद पहले बार भारत माता ने इतने तिरंगे बेटे-बेटियों के हांथो में देखे, जबरदस्त मार्केटिंग और एक स्वच्छ व्यक्तित्वा 'अन्ना' को ले कर अरविन्द केजरीवाल ने आंदोलन की शुरुआत की, देश उबाल रहा था , केंद्र की कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार से देश की विकास गति अवरुद्ध हो चुकी थी ऐसे में जब रामलीला मैदान से अण्णा ने हुंकार भरी, तो ऐसा लगा मनो पूरा देश वन्दे मातरम के नरो से गूंज रहा था, पूरा हिंदुस्तान जैसे सड़को पर था, कुमार विश्वास, मनीष सिशोदिअा , किरण बेदी इस आंदोलन के कुछ प्रमुख चेहरों में थे , बाद में परिस्थितियां बदलती चली गई. अण्णा राजनीतिक पार्टी के विरोध में थे जब की अरविन्द चाहते थे कि राजनीति में आये बिना इसकी गन्दगी साफ़ नही की जा सकती , वही अन्ना हज़ारे का कहना था की राजनीत एक दल दल है और वह जाने से आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा. अगर गौर से देखा जाये तो अन्ना हज़ारे की बात सही निकली और आंदोलन कमजोर होता गया . केजरीवाल की राजनैतिक महत्वाकांछा ने एक नए राजनैतिक शक्ति को जन्म दिया "आम आदमी पार्टी ".

साथ ही साथ इस आंदोलन की एक और उपलब्धि रही , कांग्रेस का कमजोर होना . इस आंदोलन ने कमजोर कांग्रेस की नीव भी रखी, कांग्रेस की हठी रवैये ने उनका ग्राफ निचे गिराया और भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी का प्रादुर्भाव हुआ , सच कहा जाये तो भारतीय जनता पार्टी ने २०१४ आम चुनाव में जो जीत के लड्डू खाये उसमें अन्ना आंदोलन का एक बहुत बड़ा योगदान भी रहा जिसने कांग्रेस को कमजोर किया.

आंदोलन के तुरंत बाद हुए दिल्ली के विधानसभा चुनावों में पहली बार आम आदमी पार्टी ने सिरकत की और केजरीवाल को बड़ी भरी कामयाबी हाँथ लगी , दिल्ली को नया नेता मिला मुख्यमंत्री "अरविन्द केजरीवाल ", पर इस बार कांग्रेस के साथ सरकार बना कर. आप और कांग्रेस के इस समझौते से केजरीवाल की छवि को काफी धक्का लगा , फिर लगभग महीने भर की सरकार को गिरा कर केजरीवाल ने अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी चला दी , इससे केजरीवाल के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा , कुर्सी छोड़ केजरीवाल फिर से अनसन पर बैठे, सवाल उठने लगे की आखिर जब अनशन पर ही बैठना था तो नयी पार्टी क्यों बनाई? पर केजरीवाल की नज़रें कही और थी |शायद वो हिंदुस्तान का तख़्त तलाश रहे थे. उन्होंने मोदी को बनारस में चुनौती दी और सम्पूर्ण भारत में अपने कैंडिडेट इलेक्शन में उतारे , पर परिणाम सबके सामने था. हालत इतने बुरे थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की बनारस में तो उनको हार मिली ही दिल्ली से भी उनको बुरी खबरें ही हाँथ लगी ,आप सभी ७ लोकसभा की सीटें हार गयी, केजरीवाल दिल्ली हार गये.



केजरीवाल ने पुनः पार्टी को संगठित करना शुरू किया, दिल्ली विधानसभा के चुनाव नज़दीक थे , केजरीवाल ने इस दफा धैर्य दिखाया और विक्टिम कार्ड खेला साथ ही साथ दिल्ली छोड़ कर जाने के लिए मॉफी भी मांगी, और जो परिणाम सामने आये वो कल्पना से परे थे , ७० सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में आम पार्टी ने ६७ MLA भेजे ,बड़ी जीत , अब केजरीवाल भाग नही सकते थे अपने किये वादे पुरे करना का समय था पर जो हुआ वो कुछ अलग ही हुआ, देश ने राज्य और केंद्र की तकरार देखी , केजरीवाल हर बात की लिए केंद्र की तरफ उंगली उठाते नज़र आये , दिल्ली की जनता ने इसे बिलकुल भी पसंद नही किया , और २०१७ में हुए MCD चुनाव में दिल्ली ने अरविन्द केजरीवाल को बताया की उनके द्वारा जगाई हुई जनता उनका भी नही सुनेगी अगर वो अच्छा काम नही करेंगे. दिल्ली एक आंदोलनकारी में नेता ढूंढ रही थी और केजरीवाल राज्य से देश साधने में लगे थे|

विवादों के अरविन्द


विवादों से अरविन्द का चोली दामन का साथ रहा, कभी तो केंद्र से झगड़ते नज़र आये तो कभी पार्टी की ऐसे विश्वस्य लोगो से जिन्होंने अरविन्द के साथ ये पार्टी बनाई थी. कभी किसान ने भरी सभा में केजरीवाल के सामने आत्महत्या कर ली उस वजह से तो कभी अपने बयानों की वजह से अरविन्द हमेशा विवादों में रहे| विधायकों पर फ़र्ज़ी डिग्री का आरोप, पार्टी के संविधान के विरुद्ध जाने का आरोप तो देश के कानून के विपरीत जाने के आरोप भी उनपर लगते रहे. जब दिल्ली गन्दगी और बिमारियों से जूझ रही थी तो उनके विधायक विदेशो में घूमते रहे, इससे भी आम पार्टी की खासी किरकिरी हुई, विज्ञापनों पर जनता की पैसे बर्बाद करने की आरोप से लेके थाली के रेट पर भी विवाद हुए. कभी अरविन्द केजरीवाल पार्टी मेम्बरों को डराते नज़र आये तो कभी दिल्ली की जनता को. पंजाब चुनावों के नतीजों ने भी अरविन्द केजरीवाल को खासा परेशान किया, आम आदमी बैकफुट पर नज़र आयी और वो इस दफा भारत के निर्वाचन आयोग को कोसते नज़र आये. कभी वो JNU मुद्दे पर गलत पक्ष लेते नज़र आये तो कभी सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते, अरविन्द अपनी भाषा को लेकर भी विवादों में रहे, कभी वो प्रधानमंत्री को अपशब्द कहते नज़र आये तो कभी दिल्ली पुलिस के जवान को ठुल्ला कहते नज़र आये.



अब तो हद है



इस बार तो हद ही हो गयी जब उनके ही भूतपूर्व मंत्री ने ऊपर २ करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और आम आदमी पार्टी इसपर बोलने से बचती रही.

भ्रष्टाचार विऱोध से मोदी विऱोध की राजनीति तक



अरविन्द गाया करते थे - सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही, मेरी कोशिश है की ये तस्वीर बदलनी चाहिए, पर ऐसा होता कुछ दिखा नही उल्टा केजरीवाल अब भ्रष्टाचार विऱोध की राजनीति छोड़ मोदी विऱोध की राजनीति कर रहे है, उनकी कोशिश शायद ये है की वो देश को दिखाए की वो ही सच्चे विपक्ष की भूमिका में है| पर विपक्ष की भूमिका निभाते निभाते अरविन्द ऐसे रास्तो पर खड़े दीखते हैं जो उनके कर्मठ वयक्ति वाले चरित्र पर दाग लगा रहा है| शायद ये ध्रुव तारा धूमिल हो रहा है |






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