सोशल नेटवर्क ने बदल दिए है घरेलु रिश्तों के मायने

Chandni | Sep 14, 2017 02:09 PM


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Whatsapp, facebook, intagram or twitter आप ये सोच रहे होंगे की आखिर ये हो क्या रहा है. मैं क्यों ये सारे सोशल नेटवर्किंग साइट्स के नाम याद कर रही हूं?? असल में देखा जाए तो आज कल ये हमारे ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए हैं . जैसे माँ- बाप, भाई-बहिन,पति-पत्नी ये सारे रिश्ते ही है जिसके बिना हम खुद को अकेला मानते है पर आज इनसब की जगह सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने ले ली है. अगर आप अकेले हो आस पास कोई नहीं है तो जुड़ जाते हो एक सोफे पर बैठे बैठे हज़ारो से. थोडा हाल चाल ले लिया, थोडा गॉसिप भी कर लिया अब अगर दोस्तों से ग्रुप में बात करना मिस कर रहे हो तो whatsapp ने तो इसकी भी व्यवस्था कर दी है तो एक ग्रुप बना लो और खूब बातें करो हसी -मजाक मौज -मस्ती टांग खिचाई सब हो गई पर आपने ये नोटिस किया की आपके ठीक बगल में कौन बैठा है? वो आपके माँ बाप भी हो सकते है भाई या बहिन भी या कोई भी करीबी जो बस इसे इंतज़ार में बैठा है की अब आपके पास समय होगा बैठ के बात चीत करने का. पर जब तक आपके पास बैठे व्यक्ति के लिए आपको समय मिल पता है तब तक आपको कोई दूसरा काम याद आ जाता है क्यों कि सारी एनर्जी और excitement तो आपने चैट करने में लगा दी जो आपसे कोसो दूर बैठा है.

ये सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी न बहुत अजीब चीज़ है  कोसो दूर बैठे दोस्तों से तो मिलवा देता है पर हमें हमारे ही परिवार से दूर कर रहा है. आज कल सेल्फ़ि लेना स्टेटस अपडेट करना एक जरुरी काम ही हो गया है. लोग बिना सेल्फ़ि लिए एक पिज़्ज़ा का टुकड़ा तो खा ही नहीं सकते या ये कहो की घर में लव यू माँ कहना जरुरी नहीं पर पूरी दुनिया को आई लव माय मौम का इमेज लगा के जाताना जरुरी हो गया है. एक चलन सी हो गई है हमारे सोसाइटी में कही घुमने नहीं गये तो 'यार लाइफ तो बहुत बोरिंग है' और घूम के आये तो पिक्चर पोस्ट किये बिना तो नींद ही हराम है और अगर आपने दुसरे की पिक देख ली तो तुरंत आपके दिमाग में क्या आता है?? मैं बताती हूँ - यही की यार क्या लाइफ है कितना ऐश है मेरी क्या लाइफ झंड हो गई है.


अब तो 100 बात की एक बात यही है की आज कल लोग दिखावा पे भरोसा करने लगे है. जो फेसबुक और whatsapp यूजर नहीं है उसे सीधे हम यही समझ लेते है की "how outdated you are". जब की सही मामले में लाइफ तो उनकी ही है जो बिना फेस बुक और व्हात्सप्प के परिवार ले साथ शाम का एक कप चाय पीना एन्जॉय करते है. समोसा और चटनी का मजा एक साथ लेते है. हर सिक्के के दो पहलु होते है हम एक तरफ नए नए टेक्नोलॉजी से अपडेट होते जा रहे है वही दूसरी तरफ सोशल नेटवर्किंग साइट्स से जुड़ कर अपनों से दूर हो रहे है. हम भले ही खुद को तस्सली दे रहे है इस बात से की इन सब का दोषी व्हात्सप्प और फेसबुक है पर असल में हम खुद दोषी है क्यों कि  हमारे अन्दर रिश्तो को जोड़ के रखने की कला ही नहीं है हम बैलेंस नहीं कर पते हमने online और offline रिश्तों के बीच. आज से बस 10 साल पीछे जाओ तो याद आती है वो शाम छत पे जब सारे बच्चे बैडमिंटन या क्रिकेट खेल के झगडा करते थे की यार तुमने चीटिंग की और थक के जब माँ के पास जाओ तब माँ खाना लगाती थी और हम बस खाते खाते भी बस बातो में पूरा शाम के खेल का एक हाईलाइट दे देते थे. अब वो समय कहाँ अब तो बस लाइफ डिजिटल हो गई है. बस 10 साल में जब ये अंतर आ सकता है तो आप अगले 10 साल का खुद ही हिसाब लगा लो की हम कहाँ पहुचने वाले है. रिश्ते और परिवार से तो वैसे भी हमारा संपर्क टूट गया है. अब तो माँ बाप और भाई बहिन ही रह गए है रिश्ते निभाने को. दूरियां जिस तेज़ी से बढ़ रही है मुझे तो शक है कि आने वाले कुछ दिनों में ये रिश्ते भी एक फॉर्मेलिटी ही रह जाएगी.