जब एक लाख की सेना भी ख़तम हो गयी, पानीपथ का दर्दनाक सच

Nanhe Sipahi | Jul 05, 2017 06:07 PM


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दिल्ली की एक खास बात है | दिल्ली ने सब कुछ देखा है | बनती सल्तनत से लेकर बिगड़ते सुल्तान तक | दिल्ली ने सब कुछ झेला है | अतिक्रमण और आतंक भी | दिल्ली से सब कुछ देखा है - तलवार की धार पर हुकूमतों को पलटते भी देखा है | भाई को भाई का दुश्मन बनते देखा है | षड़यंत्र, राजनित, मोहब्बत, नफरत और परिवर्तन भी | दिल्ली ने तख़्त बनते बिगड़ते देखे है | तो खून की नदिया बहते हुए भी दिल्ली ने देखा है | कई बार हिंदुस्तान ये सोचने पर विवश हुआ कि आखिर हमारे पास ऐसा क्या था जिसने उपद्रवियों को हमारे ऊपर हमले करने को प्रेरित करता था | वो था हिंदुस्तान का सोना | भारत उस समय में विश्व का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था. भारत में व्यापार करने आने वाले लोग सोना लेकर ही आते थे.


यही एक मुख्य कारण था कि उस समय भारत में घर-घर में सोने के भंडार होते थे. भारत के मंदिरों में उस समय सोने के अपार भण्डार हुआ करते थे. यही एक मुख्य कारण था कि विदेशी शासक भारत में लूट के लिए आना चाहते थे.



आज हम आपको ऐसे हे एक ऐसे युद्ध के बारे में बताएंगे जिसकी अपनी ही एक गाथा है | जिसके बारे में सोच कर रूहें भी डरती थी | हम बाद करेंगे पानीपथ के युद्ध की जिसने हिंदुस्तान के इतिहास में तलवार के हुकूमत की नयी शुरुआत की | अभी तक हिंदुस्तान ने तलवार का वार देखा था | अब बारी थी बारूद के बवंडर की |

हिन्दू राजाओं की कायरता –




पानीपत की लड़ाई

वैसे पानीपत की लड़ाई के बारें में आगे पढ़ने से पहले यह जानना जरुरी है कि आखिर क्या मुगलों में वाकई दम या फिर वह बस किस्मत के भरोसे ही उत्तर भारत पर कब्जा कर पाए थे.



असल में इब्राहिम लोधी अपने पिता सिकन्दर लोदी की नवम्बर, 1517 में मृत्यु के उपरांत दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुआ था. पिता की मृत्यु के बाद राज्य को संभालना बेटे के लिए वाकई मुश्किल हो रहा था. दिल्ली की सत्ता और जनता दोनों की ही स्थिति कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी. लेकिन इस मौके का फायदा किसी भी हिन्दू राजा ने नहीं उठाया. असल में तब अगर उत्तर भारत के आसपास के राजा एक होकर दिल्ली पर हमला कर देते तो आसानी से दिल्ली को वापस प्राप्त किया जा सकता था. लेकिन एक कड़वा सत्य यह है कि उस समय के हिन्दू योद्धाओं का खून भी ठंडा हो चुका था.

तो कैसे उतर भारत पर मुगलों का कब्जा हुआ?




जब दिल्ली की सत्ता कमजोर थी जो बाबर को यह मौका युद्ध के लिए अच्छा लगा.

बाबरनामे में इस युद्ध के बारे में लिखा है कि बाबर बस कुछ 25 हजार की सेना लेकर ही युद्ध करने आ रहा था.

वहीं इब्राहिम लोधी के पास करीब 1 लाख लोगों की सेना थी. असल में लोधी को यह लग रहा था कि मात्र एक छोटी-सी सेना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है.

बाबर को रोकने के लिए इब्राहिम लोधी ने अपने एक सेवक को सेना के साथ भेजा. कहते हैं कि पानीपत की लड़ाई जो हिसार के आसपास कहीं हुई थी. लेकिन यहाँ बाबर ने सामने वाले की सेना को हरा दिया.




तब इब्राहिम लोधी समझ गया था कि यह सेना कोई मामूली सेना नहीं है. लेकिन तब तक वह यह समझ नहीं पाया था कि बाबर के पास बारूद और तोपें हैं.

युद्ध का दिन भी आया –




तो इस तरह से 25 अप्रैल 1526 को इब्राहिम लोधी और बाबर की सेना का आमना-सामना हुआ और यह युद्ध भारत की नई तक़दीर लिख रहा था. इब्राहिम लोधी के सैनिकों के पास तलवार और हल्का बारूद था किन्तु बाबर की तोपों का सामना कोई नहीं कर सकता था.

यह युद्ध एक तरफ़ा युद्ध था और इस युद्ध में इब्राहिम लोधी को मार दिया गया और इस मृत्यु के साथ ही बाबर वंश ने दिल्ली में नया इतिहास लिखा था.

इस तरह पानीपत की लड़ाई में से एक लाख की सेना भी बाबर को भारत में अपना साम्राज्य फैलाने से नहीं रोक सकी.

इस युद्ध के साथ लोधी साम्राज्य का अंत हुआ था और मुग़ल साम्राज्य का भारत में उदय हुआ था.




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