इस महिला ने जनता पार्टी कि रैली में मुर्दाबाद के नारे लगवा दिए

Nanhe Sipahi | Aug 07, 2018 12:08 AM


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बात सितम्बर 1977 की है जब देश में जनता पार्टी की सरकार थी, कांग्रेस और इंदिरा गाँधी को देश की जनता नाप चुकी थी, इमरजेंसी का दौर ख़तम हो चूका था देश की सर्वोच्चा सत्ता पर एक अति महत्वकांशी सरकार जन्म ले चुकी थी नाम था जनता पार्टी.




जनता पार्टी ने जाति के भेद भाव को दूर करने के लिए सितम्बर 1977 को दिल्ली के कोनसीटूशन क्लब में ३ दिन की एक सभा बुलाई थी. भाषणों का दौर चल रहा था. बारी राजनारायण की थी. ये वही राजनारायण थे जिनके केस की वजह से इंदिरा गाँधी को अपनी लोकसभा की सदयस्ता गवानी पड़ी थी, बाद में राजनारायण ने ही रायबरेली से इंदिरा गाँधी को 55000 से भी ज्यादा मतों से हराया था. राजनारायण ने अपने भाषण में 'हरिजनों' को सम्बोधित किया और बार बार इस शब्द का प्रयोग भी किया. मंच के सामने कई दलित नेता बैठे थे पर किसी ने भी इस शब्द प्रयोग पर कोई आपत्ति दर्ज नही की.



राजनारायण के भाषण के पश्चात कई दूसरे बड़े नामो ने अपनी अपनी बातें रखी. फिर बारी आयी एक २१ वर्षीय महिला की. इस २१ वर्षीय महिला ने जब अपना भाषण शुरू किया तो सब आवक रह गए. इस २१ वर्षीय महिला ने न केवल राजनारायण को कोसा बल्कि जनता पार्टी, कांग्रेस और राजनारायण की धज्जियाँ उड़ा दी. उस महिला ने जनता पार्टी के मंच से कहा कि ये समाजवादी नेता अपने आप को खुदमुख्तार समझते हैं पर इन्हे ये तक नही पता कि दलितों के लिए हरिजन शब्द का प्रयोग करना भी एक तरीके का अपमान करना है. हमारे भगवान बाबा साहब आंबेडकर ने भी कभी हरिजन शब्द का इस्तेमाल नही किया, उन्होंने संविधान बनाया और संविधान में भी हमारे लिए अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग किया फिर राजनारायण की हिम्मत कैसे हुई हमें हरिजन कह कर सम्बोधित करने की.



मंच और मंच के सामने कोहराम मच चूका था, जनता पार्टी हाय हाय के नारे लगने लगे थे, ये एक अद्भुत नज़ारा था जब किसी पार्टी के मंच से ही पार्टी की धज्जियाँ उड़ा दी गयी थी और जनता भी उसी पार्टी के हाय हाय और मुर्दाबाद के नारे लगा रही थी. ये महिला अब स्टार बन चुकी थी नाम था मायावती. मंच के सामने बामसेफ जो कि दलित उत्थान के लिए बनायीं गयी पार्टी थी के कुछ लोग मौजूद थे. बामसेफ के मुखिया कांसीराम हुआ करते थे. बाद में मायावती का नाम कांसीराम तक भी पंहुचा. कांसीराम चुकी पंजाब से थे इसलिए उन्हें इस बात का इल्म था कि उत्तरप्रदेश में पैठ बनाने के लिए उन्हें वही के चेहरे की जरुरत पड़ेगी, चुकी उत्तरप्रदेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दलित था, इसलिए कांसीराम को वहां संभावनाएं नज़र आ रही थी.



मायावती उन दिनों सिविल सर्विसेज की परीक्षाओ की तैयारी कर रही थी. दिसंबर १९७७ को कांसीराम सीधे मायावती के घर पहुंचे और मायावती से पूछा की क्या वो ये स्थान लेना चाहेगी, कांसीराम का कहना था बहुत सरे लोग उनकी बिरादरी के सिविल सर्विसेज में गए है पर समाज के लिए ज्यादा कुछ नही कर पा रहे क्यों की उन्हें भी नेताओ की सुननी पड़ती है. कांसीराम ने मायावती को वादा किया कि मायावती को एक ऊँचा मुकाम हांसिल होगा. फिर बाद में परिवार से बगावत के बाद मायावती का राजनीत में पदार्पण हुआ. बाकि अब इतिहास है.




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