तो क्या जेपी नही थे इमरजेंसी के असली वजह

Nanhe Sipahi | May 30, 2017 01:05 PM


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सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ..
स्वतंत्र भारत के इतिहास के शायद सबसे बड़े गांधीवादी, जय प्रकाश नारायण ने इमरजेंसी के ठीक एक दिन पहले दिल्ली के रामलीला मैदान से हुंकार भरी और अगले दिन सुबह 6 बजे पुरे हिंदुस्तान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को रेडियो पर कहते सुना कि भारत में आतंरिक आपातकाल लग चूका है | तब से अबतक लगभग 4 दशक कि राजनित हिंदुस्तान के तख़्त ने देखी पर एक प्रश्न अभी तक वैसे ही खड़ा है - क्या JP के उस हुंकार ने इंदिरा को इमरजेंसी लगाने के लिए विवश किया ?



इस प्रश्न कि खोज में हमें हिंदुस्तान के इतिहास के कुछ पन्ने पलटने पड़ेंगे , शायद इस प्रश्न का उत्तर उन्ही पन्नो में कहीं धूमिल हो गया है, शुरू करते हैं सन 1971 से -




शक्तिशाली इंदिरा गाँधी
1971 में जेनेरल इलेक्शन की तैयारी चल रही थी , इंदिरा गाँधी के विरुद्ध विपक्ष ने नारा दिया "इंदिरा हटाओ", इंदिरा ने जवाब दिया "गरीबी हटाओ", शायद इंदिरा गाँधी के इस नारे ने 1971 के चुनाव की दशा बदल के रख दी , आम जनमानस में ये नारा घर कर गया और इंदिरा गाँधी पूर्ण बहुमत से सत्ता में वापिस आयीं, मार्च 1971 की ५वी लोकसभा में इंदिरा ने 352 MP भेजे और अपार नरसमूह की एक मात्र नेता के रूप में खुद को स्थापित कर लिया | इसी साल दिसंबर में भारत पाकिस्तान का युद्ध हुआ और भारतीय फोजों ने जिस प्रकार पाकिस्तानियो को धूल चटाई उसने इंदिरा गाँधी को असीमित शक्ति प्रदान की | वो अब हिंदुस्तान की एक मात्र नेता बन चुकी थीं |
1972 में मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र, राजस्थान , गुजरात और कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने थे , इंदिरा गाँधी ने बिहार , पंजाब और हरयाणा की विधानसभा भी समय से पहले भंग करवा दी और इन राज्यों के भी चुनाव करवाने का ऐलान कर दिया , चुनाव हुए और इंदिरा की कांग्रेस ने सभी प्रदेशो में बम्पर जीत हासिल की | 1972 के अंत तक तमिलनाडु को छोड़ सरे प्रदेश में कोई अगर था तो सिर्फ कांग्रेस थी और एक मात्र नेता - इंदिरा गाँधी |
इंदिरा गाँधी 1972 के अंत तक काफी शक्तिशाली हो चुकी थी, हिंदुस्तान के पटल पर बस एक हे नाम था - इंदिरा | इंदिरा लोकप्रियता के शिखर पर थी | इसी लोकप्रियता के नाव पर इंदिरा ने 2 बड़े फैसले किये -
  • 14 प्राइवेट बैंको को सरकार के हांथो में लेने का फैसला |
  • राजा महराजाओ को मिलने वाले पेंशन को ख़तम करने का फैसला जिसे प्रिवी पर्स के नाम से जाना जाता है |




कार्यपालिका और न्यायपालिका की तकरार
पर सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा के इस फैसले पर रोक लगा दी और इस फैसले को गलत बताया , ये वो दौर था जब देश ने न्यायपालिका और कार्यपालिका का अंतर्विरोध को खुले तौर पर देखा था | वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर रे बताते हैं की कैसे सुप्रीम कोर्ट इंदिरा के फैसलों को पलट देता था | सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को काफी आहत किया और प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के पर कतरने की ठान ली | न्यायपालिका और कार्यपालिका के इस अंतर्विरोध ने संविधान के 24वे और 25वे संसोधन की नीव रखी|

5 नवंबर 1971 को 24वा संसोधन लाया गया जिसमें कहा गया की संसद संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव ला सकती है चाहे इससे संविधान की मूल भावना ही क्यों न बदल जाये |3 साल पहले ही मशहूर गोलकनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की संसद के पास संविधान के मौलिक अधिकारों में बदलाव करने का अधिकार नही है |गोलकनाथ केस में ये कहा गया की संसद के पास संविधान बदलने के असीमित अधिकार नही होंगे | 1972 के अप्रैल महीने में 25वा संसोधन लाया गया , इस संसोधन ने सरकार को उन मुद्दों को लागू करने का अधिकार दे दिया जिसे इंदिरा सुप्रीम कोर्ट में हार गयी थी | इस संसोधन ने 14 प्राइवेट बैंको का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स जैसे मुद्दों को इंदिरा को फिर से लागू करने में मदद मिली | इंदिरा के इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में फिर से चुनौती दी गई, जिसे केशवानंद भारती केस कहा जाता है | वस्तुतः केशवानंद केस के साथ शुरू हुआ वो सफर जो इमरजेंसी की तरफ जाता है | हिंदुस्तान के इतिहास में पहले और आखिरी बार 13 जजों  की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की | 24 अप्रैल 1973 को इस बेंच ने अपना फैसला सुना दिया जिसमें सरकार 7-6 से केस हार गयी | सुप्रीम कोर्ट ने फिर से सरकार को बताया की संसद के पास संविधान को बदलने के असीमित अधिकार नही है और वो संविधान के मूल भावना के साथ छेड़छाड़ नही कर सकती |


जजों की नियुक्ति
सुप्रीम कोर्ट की इस रोक ने इंदिरा को परेशान कर दिया , देश के लगभग सभी राज्यों में सरकार , लोक सभा और राज्यसभा में बहुमत इन सबके बाद भी इंदिरा खुद को कमजोर महसूस कर रही थी | क्यों की कोर्ट उनका नही था , इस बड़ी हार ने इंदिरा को झकजोर कर रख दिया अब उन्होंने निर्णय किया - सुप्रीम कोर्ट पर कब्ज़ा करने का |इंदिरा गाँधी ने एक ऐसा फैसला लिया जिसके बारे में आज भी सोचना मुश्किल है | केशवानंद केस पर फैसला सुनाने के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस S M Sikri रिटायर हो गए, सरकार के लिए अब नए चीफ जस्टिस को चुनने का समय था | परंपरा की मुताबिक़ वरिष्ठता की आधार पर जस्टिस J M Shelat को चीफ जस्टिस बनाना चाहिए था पर इंदिरा ने जस्टिस J N Ray को मुख्या न्यायाधीश चुना वो भी 3 सीनियर जजों को नज़रअंदाज़ कर के | इससे बाकि की ३नो वरिष्ठ जजों ने इस्तीफा दे दिया | जस्टिस A N Ray ने न केवल केशवानंद भारती केस बल्कि अन्य सारे केस में सरकार का पक्ष लिया था , इसी लिए इंदिरा ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त कर दिया | इंदिरा इसे कबीटिट जुडीसरी कहती थी मतलब सरकार की फैसलों में न्यायपालिका का हस्तक्षेप न हो |



जेपी  की भूमिका 
सर्वोदय नेता जेपी नारायण इंदिरा गाँधी के इस निर्णय से नाराज़ थे , 15 दिसंबर 1973 को जय प्रकाश नारायण ने देश के सभी सांसदों के नाम एक खुली चिट्टी लिखी , इस पत्र में उन्होंने लिखा कि अगर देश के चीफ जस्टिस की नियुक्ति का अधिकार देश की प्रधानमंत्री के हांथो में होगा तो ऐसे व्यवस्था सरकार के हांथो की कटपुतली की तरह होगी |


आंदोलनों की शुरुआत
एक तरफ इंदिरा गाँधी कानूनी मोर्चे पर लड़ाई लड़ रही थी वही दूसरी तरफ देश की आर्थिक हालत बद से बदतर होते जा रही थी | देश की बढ़ती महंगाई ने गुजरात की नव निर्माण आंदोलन की नीव रखी, गुजरात में तब कांग्रेस की चिमन भाई पटेल की सरकार थी, अहमदाबाद की L D Engineering कॉलेज की छात्रों ने तब मेस बिल बढ़ने को लेकर 20 दिसंबर 1973 को आंदोलन कर दिया | छात्रों की इस आंदोलन को पूरे गुजरात से भी समर्थन मिला | 25 जनवरी 1974 को आंदोलन ने वृहद् रूप ले लिया , सरकार ने गोलियां चलाई , आर्मी को बुलाया गया , जिसके वजह से गुजरात की चिमन भाई पटेल सरकार ने राज्य में कर्फू की घोषणा कर दी | अगले सुबह गणतत्र दिवस देश के इतिहास का वो पहला गणतंत्र था जब राज्य ने कर्फू के बीच गणतंत्रता दिवस मनाया | आखिर हुआ वही जो छात्र चाहते थे | चिमन भाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा बाद में विधान सभा भी भंग हुई पर इससे पहले 100 से ज्यादा जानें गई, 3000 लोग घायल हुऐ, 8000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई | जेपी नारायण इस आंदोलन से काफी प्रभावित हुऐ , उन्होंने छात्र शक्ति को समझा |
गुजरात का मामला अभी ठंढा भी नही हुआ था कि बिहार में आंदोलन की शुरुआत हो गयी, इस आंदोलन में एक नया मोड़ आया 18 मार्च 1974 को जब छात्रों कि समूह से ज्ञापन लेने की बजाये प्रदेश की अब्दुल गफूर सरकार ने लाठी चार्ज करवा दिया | इससे आंदोलन हिंसक हो गया और सरकार को गोलिया चलानी पड़ गई जिसमें 2 छात्रों की मृत्यु हो गयी | 30 मार्च 1974 को जेपी ने आंदोलन के नेतृत्वा करने का फैसला ले लिया | जेपी ने 8 अप्रैल 1974 को पटना में साइलेंट प्रोटेस्ट किया | फिर 5 जून 1974 को पटना में एक बहुत बड़ी रैली का नेतृत्व किया और सत्ता परिवर्तन के लिए आवाज़ बुलंद कर दी साथ ही साथ सम्पूर्ण क्रांति का नारा दे दिया | इसी साल 2 मई को जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्वा में रेलवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए | सरकार ने कठोरता से इस आंदोलन को कुचल डाला | 50000 रेलवे कर्मचारी गिरफ्तार हुऐ , हड़ताली कर्मचारी के परिवारों को रेलवे क्वाटर से निकाला गया , इंदिरा सरकार ने एक छोटे से आंदोलन को एक सिविल वॉर में तब्दील कर दिया | धीरे धीरे जेपी के आंदोलन से CPI को छोड़ बाकि सारे विपक्षी दाल जुड़ते चले गए |
इसी बीच 1 नवंबर 1974 को जेपी और इंदिरा की मुलाकात हुई जिसमें जेपी ने बिहार के अब्दुल गफूर सरकार को बर्खास्त करने कि मांग की जिसे इंदिरा ने ठुकरा दिया , वार्ता बेनतीजा ख़तम हुई इस मुलाकात ने दोनों क़े बीच की तल्खियां और बढ़ा दी , 4 नवंबर 1975 को ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ और बिहार सरकार ने दमनकारी निति अपनायी | बिहार सरकार के लाठी चार्ज के शिकार जेपी नारायण भी हुऐ| गौर से देखा जाये तो इन आंदोलनो ने इंदिरा को प्रभावित तो किया पर स्थिति इतनी बुरी नही हुई थी की इंदिरा ने इमरजेंसी का फैसला ले लिया , सत्य ये है की इमरजेंसी के फैसले में न्यायालयों ने अहम् भूमिका निभाई | 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गाँधी 1 लाख से ज्यादा वोटों से जीतीं थी लेकिन रायबरेली से उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राज नारायण ने अलाहाबाद हाई कोर्ट में उनके खिलाफ मुकद्दमा कर दिया|

कोर्ट के चक्कर लगाती इंदिरा 

हिंदुस्तान के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री को किसी हाई कोर्ट में पेश होने का हुकुम सुनाया गया | जहा इंदिरा से लगभग ५ घंटे तक सवाल जवाब हुए | 12 जून 1975 को हाई कोर्ट ने फैसला सुना दिया | इंदिरा गाँधी केस हार गयी , इंदिरा के चुनाव लड़ने पर 6 साल का प्रतिबन्ध लगा दिया गया . मामला सुप्रीम कोर्ट गया , सुप्रीम कोर्ट में उन दिनों छुट्टियां चल रही थी , वेकेशन जज जस्टिस B R krishnan Aiyaar ने मामले की सुनवाई की 24 जून यानि की इमरजेंसी के एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया , इंदिरा गाँधी को सुप्रीम कोर्ट से भी निराशा ही हाँथ लगी | इंदिरा गाँधी से वोट देने के अधिकार को भी छीन लिया गया | शायद जस्टिस आइयर के इस फैसले ने इमरजेंसी की नीव रखी |


इमरजेंसी 

उसी दिन दिल्ली के रामलीला मैदान पर जेपी ने एक बहुत बड़ी रैली का आह्वाहन किया था और उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला सुनाया था , अब ये कहना तो मुश्किल है की इंदिरा किस चीज़ से ज्यादा प्रभावित थी पर ये तो तय है की इंदिरा कानूनी अड़चनों में फंस चुकी थी और इन कानूनी दाव पेंचो ने ही इमरजेंसी के नीव रखी | वैसे जानकारों का कहना है की विख्यात केशवानंद केस ने हे आंदोलनों की भूमिका तैयार की और इंदिरा को मजबूर किया इमरजेंसी के लिए |


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