सनसनीख़ेज़ ख़ुलासा : न FIR में नाम, न गवाहों के बयान, पर भगत सिंह को दे दी थी फांसी

Nanhe Sipahi | Nov 16, 2017 09:11 AM


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भगत सिंह मेमोरियल के अध्यक्ष इम्तियाज़ रशीद कुरैशी जो की लाहौर के रहने वाले हैं उनके द्वारा दायर एक याचिका ने भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में भगत सिंह जी को लेकर एक सनसनी फैला दी है, क्यूंकि उनके द्वारा दायर याचिका के बाद जब पुराने दस्तावेज़ों को खंगाला गया तो FIR में भगत सिंह जी का नाम अभी तक नही मिला है ।


    
                                                                    

कोर्ट के आदेश के बाद जब लाहौर स्थित अनारकली थाने में अँगरेज़ अधिकारी सैंडर्स हत्याकांड की FIR की तलाश की गयी तो FIR तो मिल गयी पर उसमे भगत सिंह जी का नाम नही मिला है, कहा जा रहा है कि अंग्रेज़ों ने बिना सबूत के ही भगत सिंह जी को फांसी दे दी थी क्यूंकि उनकी लोकप्रियता से अंग्रेज़ों के पसीने छूट रहे थे  ।

ग़ौरतलब है कि 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर में पुलिस को शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम नहीं मिला है। भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद इस महान स्वतंत्रता सेनानी की बेगुनाही को साबित करने के लिए यह एक बेहद बड़ा खुलासा है।

पाकिस्तान में स्थित भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी ने ये याचिका दायर की थी। इसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ तत्कालीन एसएसपी जॉन पी. सैंडर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर की सत्यापित कॉपी मांगी गई थी। लाहौर पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर अनारकली थाने के रिकॉर्ड की गहन छानबीन की और सैंडर्स हत्याकांड की एफआईआर ढूंढ़ने में कामयाब रहे। उर्दू में लिखी यह एफआईआर अनारकली थाने में 17 दिसंबर 1928 को शाम 04:30 बजे दो अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी।

इसी थाने का एक पुलिस अधिकारी इस मामले में शिकायतकर्ता था। चश्मदीद के तौर पर उसने कहा कि जिस व्यक्ति का उसने पीछा किया, वह 5 फुट 5 इंच लंबा था, हिंदू चेहरा, छोटी मूंछें और दुबली पतली और मजबूत काया थी। वह सफेद रंग का पायजामा और भूरे रंग की कमीज और काले रंग की छोटी क्रिस्टी जैसी टोपी पहने था। आईपीसी की धारा 302, 120 और 109 के तहत केस दर्ज किया गया था।

लाहौर पुलिस की विधिक शाखा के इंस्पेक्टर ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (लाहौर) तारिक महमूद जारगाम को सीलबंद लिफाफे में एफआईआर की सत्यापित कॉपी सौंपी। कॉपी मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि भगत सिंह के मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधिकरण के विशेष न्यायाधीशों ने मामले के 450 गवाहों को सुने बिना तीनों को मौत की सजा सुना दी। भगत सिंह के वकीलों को जिरह का अवसर नहीं दिया गया।

कुरैशी ने लाहौर हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की है, जिसमें भगत सिंह मामले को दोबारा खोलने की मांग की गई है। उन्होंने कहा, मैं सैंडर्स मामले में भगत सिंह की बेगुनाही को स्थापित करना चाहता हूं। लाहौर उच्च न्यायालय ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है, ताकि सुनवाई के लिए बड़ी बेंच गठित की जा सके। गौरतलब है कि भगत सिंह को सैंडर्स की हत्या के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी और महज 23 साल की उम्र में 1931 में उन्हें लाहौर के शादमान चौक पर फांसी दी गई थी।





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