Part 1 - १९७१ के भारत पाक युद्ध के साथ ही शुरू हो गयी थी विश्वयुद्ध की तैयारी

Nanhe Sipahi | Jul 19, 2017 01:07 PM


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१९७१ एक ऐसा साल जिसे भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग हर इंसान जानता है. ये वो साल है जब पाकिस्तान को २ टुकड़ो में तोड़ने में भारत ने सफलता पायी थी. भारतीय इस साल को अपनी जीत के तौर पर याद करते हैं जब कि पाकिस्तान के लिए ये किसी दुखद इतिहास से कम नहीं है. वही बांग्लादेशी इसे आजादी के साल के तौर पर याद करते हैं. वैसे बहुत कम ही लोग ये बात जानते हैं कि इस युद्ध ने एक और विश्वयुद्ध की भूमिका गढ़ दी थी. रूस और अमेरिका एक दूसरे के सामने आ गए थे. ब्रिटेन भी अमेरिका का साथ देने हिन्द महासागर पहुंच गया था. चीन और श्रीलंका भी भारत के खिलाफ खड़े हो गए थे. अगर पाकिस्तान ने एक दो दिन की देरी की होती आत्मसमर्पण में तो युद्ध का परिणाम कुछ और भी हो सकता था. १९७१ भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत भी थी. आइये आपको ये बताते हैं १९७१ का पूरा सच



१९७१ में जब ये दो बड़े एशियाई प्रतिद्वंदी आमने सामने की लड़ाई में उतरे तब भारत की तैयारी पूरी थी. वही पाकिस्तान को बड़े स्तर पर जीवन, संपत्ति और क्षेत्र का भरी नुकसान हुआ. जैसा कि आप जानते हैं कि ये विषय विवादस्पद लगता है. इस लिए इससे पहले कि हम इस युद्ध की सच्चाई बाहर लाना शुरू करें, हम यह बताना चाहेंगे कि इस आलेख में हर जानकारी का स्रोत है. लेख विभिन्न स्रोतों के एक विस्तृत विश्लेषण के बाद लिखा गया . अनुच्छेद के अंत में सभी संबंधित और तत्काल स्रोत सूचीबद्ध हैं।

१९७१ से पहले, पूर्वी पाकिस्तान के रूप में बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था। पाकिस्तान के एक सम्मानित पत्रकार नजम सेठी के मुताबिक, पूर्वी पाकिस्तान ने हमेशा शिकायत की कि वे कम विकास निधि प्राप्त करते हैं और पश्चिम पाकिस्तान (पंजाबी) सरकार पर हावी होने से पाकिस्तान का पूर्वी प्रान्त कम ध्यानाकर्षण कर पता है। पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों ने भी राज्य भाषा के रूप में उर्दू को अपनाने का विरोध किया। आज का बंगलादेश और तब का पूर्वी पाकिस्तान एक बांग्लाभाषी बहुल क्षेत्र था. ऐसे में बंगालियों को ये लगा की उनके साथ ज्यादती हो रही है और एक देश में उन्हें एक जैसा न्याय नहीं मिल पा रहा. अगर आज का पाकिस्तान कपास बहुल क्षेत्र था तो पूर्वी पाकिस्तान में जूट की बहुतायत खेती होती थी ऐसे में बंगालियों को राजस्वा का बराबर हिस्सा न मिलना उनमें असंतोष भरता गया. बाद के दिनों में जब पाकिस्तान में चुनाव हुए तो पूर्वी पाकिस्तान के लीडरो ने भयंकर जीत हासिल की पर फिर भी पाकिस्तान में उन्हें सरकार से वंचित ही रखा गया. इन घंटनाओ ने पाकिस्तान के अंदर गृहयुद्ध जैसे स्थति उतपन्न कर दी.

पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में अपना अभियान शुरू किया ताकि बंगालियों के बीच पनपे आंदोलन और क्रोध को दबाया जा सके। कई इतिहासकारो और खुद पाकिस्तानी मीडिया ने ये माना है कि पाकिस्तानी सेना जनता की सामूहिक हत्या, लूट और महिलाओं के सामूहिक बलात्कार में शामिल थी। विदेशी मीडिया के शब्दो में अगर कहें तो भारत को इसके बारे में पता था और भारत केवल युद्ध शुरू करने के लिए ट्रिगर की प्रतीक्षा कर रहा था। भारत में बड़ी संख्या में शरणार्थियों का आना शुरू हो गया था, जो इस स्थिति में हस्तक्षेप करने के लिए भारत पर दबाव डालते रहे। इस स्थिति ने जल्द ही कई अन्य देशों का ध्यान आकर्षित किया।

मई में, इंदिरा गांधी ने यूएस प्रेजिडेंट रिचर्ड निक्सन को 'पूर्वी बंगाल में नरसंहार' और शरणार्थियों की बाढ़ के बारे में लिखा, भारत के ऊपर बढ़ते बोझ का भी जिक्र इंदिरा ने किया था । एल के झा (तब भारतीय राजदूत अमेरिका) ने किसिंजर जो की एक अमेरिकी डिप्लोमेट थे को चेतावनी दी थी कि भारत को कुछ शरणार्थियों को गोरिल्ला के रूप में वापस भेजना पड़ सकता है, निक्सन ने टिप्पणी की, "By God, we will cut off economic aid [to India]." कुछ दिनों बाद, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि 'गॉडडम इंडियन' एक और युद्ध की तैयारी कर रहे थे, किसिंजर ने कहा, 'गॉडडम इंडियन' सबसे ज्यादा उग्र लोगो में एक हैं.

अमेरिका और चीन कनेक्शन, बहुतो को इस बात की जानकारी नहीं थी
(संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश संबंधों के 929 पेज लंबे खंड XI से सभी अंश और सूत्र)

विभिन्न कारणों से तब के अमेरिका को पाकिस्तान से सहानुभूति थी. उनमें से दो कारण थे: सबसे पहला, पाकिस्तान अमेरिकी नेतृत्व वाली सैन्य संधि, सीएनटीओ और सीटो का था; दूसरी बात, अमेरिका का मानना था कि भारत की किसी भी प्रकार की जीत सोवियत प्रभाव के विस्तार के रूप में माना जाएगा, क्योंकि अमेरिका ये मानता था की भारत और रूस एक अभिन्न मित्र है और भारत रूस के प्रभाव में हैं साथ साथ अगर भारत की इस युद्ध में जीत होती है तो भारतीय उपमहाद्वीप में भारत और रूस का प्रभाव बढ़ेगा और रूस और मजबूत देश के रूप में उभरेगा जिससे अमेरिका को खतरा है, अमेरिका का मानना था की भले ही रूस और भारत गठबंधन में न हो पर भारत पर रूस का प्रभाव बहुत ज्यादा है।



२८ मार्च १९७१ को अमेरिकी विदेश मंत्री विल रोजर को ढाका से एक टेलीग्राम भेजा गया था जिसमें ढाका में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के कर्मचारी ने शिकायत की, 'हमारी सरकार लोकतंत्र के दमन को निंदा करने में नाकाम रही है, हमारी सरकार अत्याचारों की निंदा करने में नाकाम रही है। हमारी सरकार अपने नागरिकों की रक्षा के लिए सशक्त कदम उठाने में नाकाम रही है...हम पेशेवर सरकारी कर्मचारियों के रूप में वर्तमान नीति से असहमति व्यक्त करते हैं और उत्साह से आशा करते हैं कि यहां हमारे वास्तविक और स्थायी हित को परिभाषित किया जा सकता है.

इस टेलीग्राम ने चीन को भी हस्तक्षेप करने का अवसर दे दिया. अमेरिका को चीन से मदद की ज़रूरत थी और मैसेंजर पाकिस्तान था। अमेरिका ने इस मुद्दे पर चुपके से चीन से संपर्क किया, चीन ने भी अमेरिका के इस पहल का भरपूर स्वागत किया था क्यों कि चीनियों का मानना था की अगर इस लड़ाई में वो अमेरिका के साथ खड़ा होता है तो भविष्य में अमेरिका के साथ चीन के सम्बन्ध बेहतर होंगे.

जुलाई 1971 के दूसरे सप्ताह के दौरान, किसिंजर बीजिंग में पहुंचे, जहां उन्होंने चीनी प्रधान मंत्री झोउ एनलाई के शब्दों को सुना: "हमारी राय में, अगर भारत दुनिया के विचारों की उपेक्षा वर्तमान समय में जारी रखता है तो हम ये बता दें की हम पाकिस्तान के साथ है और ऐसे किसी भी परिस्थिति में हम भी चुप नहीं बैठेंगे", चीन ने साफ़ संकेत दे दिया था की वो पाकिस्तान के साथ जाने वाले हैं ऐसे में अमेरिका को भी चीन का भरपूर साथ मिला. इस पर, किसिंजर ने जवाब दिया कि चीन को यह जानना चाहिए कि अमेरिका भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन करता है।

तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने ऐसे स्थिति में पश्चिमी देशो का दौरा करने का निर्णय लिया ताकि वो उन देशो को भारतीय परिस्थिति और पाकिस्तान के अंदर चलते दमन के बारे में विश्व को बता सकें. इसी क्रम में इंदिरा निक्सन से मिलने वाशिंगटन पहुंची और उन्होंने अमेरिका को समझने का प्रयास किया की कैसे पाकिस्तान के अन्दरूनो झगडे ने भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थति को चोट पहुंचाई है, पर निक्सन इंदिरा के किसी बात को सुनने को तैयार नहीं थे. निक्सन ने इंदिरा को दो टूक जवाब दिया - उपमहाद्वीप में एक नया युद्ध सवाल से बाहर था.

अगले दिन, निक्सन और किसिंजर ने स्थिति का मूल्यांकन किया। किसिंजर ने निक्सन को बताया: 'भारतीयों ****(गली दी गयी, हम उनका उपयोग इस ब्लॉग में नहीं कर सकते ) हैं । वे एक युद्ध की साजिश रच रहे हैं। '

धीरे धीरे पूर्वी पाकिस्तान में दबाब बढ़ता गया. इस दवाब ने भारतीयों का ध्यानाकर्षण किया. भारतीय पहले से ही युद्ध की तैयारी कर रहे थे और पूर्वी मोर्चे पर अपना डेरा जमाये हुए थे. पाकिस्तान ने भारत का ध्यान पूर्वी पाकिस्तान से हटाने के लिए पश्चिमी फ्रंट खोल दिया. और ३ दिसंबर को कश्मीर और पंजाब क्षेत्रों में एयर रेड किया. सीआईए ने अमेरिकी राष्ट्रपति को बताया कि भारतीय प्रधान मंत्री का मानना है कि चीन उत्तर भारत में कभी भी हस्तक्षेप नहीं करेगा, और इस प्रकार, चीन से कोई भी कार्रवाई भारत के लिए आश्चर्यचकित करने वाली होगी और ऐसी परिस्थिति में भारतीय सेना अलग थलग पद जाएगी क्यों कि भारतीय ३ मोर्चों(सीआईए ने अमेरिकी राष्ट्रपति को बताया कि भारतीय प्रधान मंत्री का मानना है कि चीन उत्तर भारत में कभी भी हस्तक्षेप नहीं करेगा, और इस प्रकार, चीन से कोई भी कार्रवाई भारत के लिए आश्चर्यचकित होगी और भारतीय सेना तीन अलग-अलग क्षेत्रों में लड़ने के कारण परेशान स्थिति में गिर जाएगी मोर्चों (पूर्व, उत्तर और पश्चिम) पर लड़ने के लिए तैयार नहीं है.



यह सुनकर 9 दिसंबर को, निक्सन ने भारत को धमकी देने के लिए बंगाल की खाड़ी में विमान वाहक यूएसएस एंटरप्राइज भेजने का फैसला किया। यह योजना सभी चार तरफ से भारत को घेरने के लिए थी. अमेरिका का ऐसा मानना था की चारो ओर से घिरा भारत दवाब में आ जाएगा और ईस्ट पाकिस्तान में हस्तक्षेप बंद कर देगा. 10 दिसंबर को, निक्सन ने किसिंजर को निर्देश दिया कि वह भारतीय सीमा की ओर कुछ सैनिकों को स्थानांतरित करने के लिए चीन से बात करें. चीन ने ऐसी किसी भी गतिविधि में शामिल होने से इंकार कर दिया क्यों कि इस बात से दार गया की अगर वो इस लड़ाई में कूदेगा तो सोवियत रूस भी चीन पर आक्रमण कर देगा और चीन अभी रूस से मुकाबले के लिए तैयार नहीं था. हालाँकि अमेरिका ने चीन को ये भरोसा दिलाने का भरपूर प्रयास किया की रूस की ऐसी कोई भी गतिविधि को अमेरिका संभाल लेगा.

पाकिस्तानी सेना ने किसी तरह अपनी स्थिति बनाए रखी और भारतीय का विरोध जारी रखा । उनका मानना था कि चीन उत्तरी मोर्चे को खोलने की तैयारी कर रहा है जो भारतीय को धीमा या पूरी तरह से रोक देगा। वास्तव में, चीनी गतिविधियों के मिथक को भी पाकिस्तान की सेना को सूचित किया गया था ताकि उनकी जीतने की आशा को बढ़ाया जा सके और उनकी जिंदगी से लड़ने की आशा और जिंदा बचने की आशा को भी बल मिले । ढाका में पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए कश्मीर नियाजी को सूचित किया गया था: "एनईएफए फ्रंट चीनी द्वारा सक्रिय कर दिया गया है, हालांकि भारतीयों ने स्पष्ट कारणों के लिए यह घोषणा नहीं की है।" लेकिन बीजिंग ने कभी ऐसा किया ही नहीं ।


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