महाभारत में अर्जुन ही नहीं, इन 3 योद्धाओं ने भी देखा था श्रीकृष्ण का विराट अवतार

Nanhe Sipahi | Aug 31, 2017 03:08 AM


News Image
महाभारत का रण अपने आप में अद्भुत है. अनेको कवियों और लेखकों ने उस रण को अपने शब्दों में तराशने की कोशिश भी की है. इसी रण में जब अर्जुन ने अपने सगे -सम्बन्धियों के ऊपर शास्त्र प्रयोग के इंकार कर दिया था तब द्वारिकाधीश श्री कृष्ण ने अर्जुन को एक ऐसा ज्ञान दिया जिसे आज तक स्मरण किया जाता है. श्री कृष्ण ने अपने विकरण स्वरुप के दर्शन अर्जुन को दिए थे और अर्जुन को बताया था की वह तो एक निमित मात्र है और ये सब कुछ पूर्व निर्धारित है.

पौराणिक कथा के अनुसार जिस समय भगवान श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र की रणभूमि में पार्थ (अर्जुन) को गीता के निष्काम कर्मयोग का उपदेश दे रहे थे उस समय धनुर्धारी अर्जुन के अलावा इस उपदेश को विश्व में चार और लोग सुन रहे थे जिसमें पवन पुत्र हनुमान, महर्षि व्यास के शिष्य तथा धृतराष्ट्र की राजसभा के सम्मानित सदस्य संजय और बर्बरीक शामिल थे. आपको बताते चलें बर्बरीक घटोत्कच और अहिलावती के पुत्र तथा भीम के पोते थे. जब महाभारत का युद्ध चल रहा था उस दौरान उन्हें भगवान श्रीकृष्ण से वरदान प्राप्त था कि कौरवों और पाण्डवों के इस भयंकर युद्ध को देख सकते हैं.



जब गीता का उपदेश चल रहा उस दौरान पवन पुत्र हनुमान अर्जुन के रथ पर बैठे थे जबकि संजय, धृतराष्ट्र से गीता आख्यान कर रहे थे. धृतराष्ट्र ने पूरी गीता संजय के मुख से सुनी वह वही थी जो कृष्ण उस समय अर्जुन से कह रहे थे. भगवान श्रीकृष्ण की मंशा थी कि धृतराष्ट्र को भी अपने कर्त्तव्य का ज्ञान हो और एक राजा के रूप में वो भारत को आने वाले विनाश से बचा लें. यही नहीं यही वह चार व्यक्ति थे जिन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को विश्वरूप के रूप में देखा.




एकादश अध्याय में विश्वरूप दर्शन योग

दसवें अध्याय के सातवें श्लोक तक भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूति, योगशक्ति तथा उसे जानने के माहात्म्य का संक्षेप में वर्णन किया है. फिर ग्यारहवें श्लोक तक भक्तियोग तथा उसका फल बताया। अर्जुन ने भगवान की स्तुति करके दिव्य विभूतियों तथा योगशक्ति का विस्तृत वर्णन करने के लिए श्री कृष्ण से प्रार्थना की। अपनी दिव्य विभूतियों के बारे में बताने के बाद आखिर में श्री कृष्ण ने योगशक्ति का प्रभाव बताया और समस्त ब्रह्मांड को अपने एक अंश से धारण किया हुआ बताकर अध्याय समाप्त किया. यह सुनकर अर्जुन के मन में उस महान स्वरूप को प्रत्यक्ष देखने की इच्छा हुई. तब ग्यारहवें अध्याय के आरम्भ में भगवान श्री कृष्ण ने विश्वरूप के दर्शन के रूप में अपने को प्रत्यक्ष किया. इसी विराट स्वरूप में समस्त ब्रह्मांड को समाहित देख अर्जुन मोह मुक्त हुए तथा युद्ध के विरक्ति भाव से मुक्त होकर महाभारत युद्ध का निष्ठापूर्वक संचालन कर कौरवों पर विजय प्राप्त की…


News Image

महाभारत युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र का चुनाव एक बहुत बड़ा राज था!

महाभारत युद्ध और गीता की रचना कुरुक्षेत्र में युद्ध भूमि में हुई. लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ, जो युद्ध ...


News Image

भगवान शिव की कहानी

दैत्यों का स्वभाव तो सदैब से शक्तिसम्पन्न होते ही देवतावों और मनुष्यो को पीड़ित करना रहा है |ब्रह्मा जी ...


News Image

जानिए भगवान शिव क्यों कहलाए त्रिपुरारी

कार्तिक मास की पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने तारकाक्ष, ...


News Image

सफलता के लिए नरक चौदस पर जरूर करें ये उपाय

दिवाली का त्‍यौहार रोशनी का त्‍यौहार होता है। इस मौके पर घर की साफ-सफाई की जाती है। कहते हैं समृद्धि ...


News Image

महाभारत की लड़ाई में जब श्रीकृष्ण को 18 दिनों तक खानी पड़ी थी मूंगफली

महाभारत की लड़ाई में – आपने महाभारत से जुड़ी अनेक कहानियां सुनी होगीं. भगवान श्रीकृष्ण की कई लीलाओं के बारे ...