1993 बॉम्बे बम ब्लास्ट के बाद क्यों आत्मसमर्पण करना चाहता था दाऊद इब्राहिम

Nanhe Sipahi | Jul 31, 2017 11:07 AM


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1993 बॉम्बे बम ब्लास्ट के बाद क्यों आत्मसमर्पण करना चाहता था दाऊद इब्राहिम

1993 में हुआ मुंबई बम ब्लास्ट भारतीय इतिहास का वो जख्म है जो भरा नहीं जा सका. इतने दशकों बाद भी अगर मुंबई बम ब्लास्ट का जिक्र आता है तो इंसान की रूह कांप जाती है. इतने बड़े पैमाने पर देश के दिल पर चोट कभी नहीं हुई थी, लगभग पूरी मुंबई बारूद पर बैठी थी, इस बम ब्लास्ट के बाद जो २ नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहे वो थे टाइगर मेमन और दावूद इब्राहिम कास्कर. टाइगर मेमन ने ही मुंबई धमको के लिए ज़मीन तैयार की थी, लोगो को जमा करने से लेकर उनकी पाकिस्तान में हुई ट्रैंनिंग को भी टाइगर मेमन ने अंजाम दिया था, बाद में धमाकों के ठीक पहले वो देश छोड़ कर निकल गया था. टाइगर मेमन ने दाऊद से मदद ली थी इन बम धमको को अंजाम देने के लिए.

कहते हैं की बाबरी विध्वंश के बाद जो देश में बड़े पैमाने पर दंगे हुए थे उसका परिणाम था मुंबई ब्लास्ट. टाइगर मेमन की सम्पति को इन दंगो में बड़े पैमाने पर नुक्सान हुआ था, टाइगर का करोड़ों का कला धन इन दंगो में जला दिया गया और इसका बदला लेने के लिए ही टाइगर मेमन ने बम्बई को दहला देने का प्लान बनाया था. कहा ये भी जाता है मुस्लिम महिलाओ ने दाऊद को टूटी हुई चुडिया भेजी थी यह कह कर की उसने दंगो का बदला नहीं लिया. बाद में टाइगर के साथ मिल कर दाऊद ने ब्लास्ट करवाए. बॉम्बे में हुए ब्लास्ट के बाद जब जाँच एजेंसियों के अपनी जाँच शुरू की तो पाया की बॉमबे पुलिस को धमाके होने वाले हैं ऐसे जानकारी मिली थी, धमाकों के ठीक पहले एक व्यक्ति को गिरफ़तार किया गया था जिसने बॉम्बे पुलिस को बताया था की धमाके होने वाले हैं. पर बॉम्बे पुलिस ने इसे संजीदा नहीं माना और उन्हें लगा की वो व्यक्ति भरमाने के लिए ऐसा कह रहा है.



एक तथ्य ये भी है कि आज कि राजनित के सबसे बड़े मुद्दों में से एक दाऊद की गिरफ़्तारी दंगो के बाद हो गयी होती अगर देश ने कूटनीतिक तरीके से सक्रियता दिखाई होती. दाऊद इब्राहिम ने विस्फोट के बाद शीर्ष आपराधिक वकीलों से परामर्श किया। वो चाहता था की वो आत्मसमर्पण कर दे. दाऊद को पता था की ब्लास्ट में उसकी भागीदारी कितनी है इस बात के पुख्ता प्रमाण तब जाँच एजेंसियों के पास नहीं था केवल कुछ साक्ष्य और लिंक थे जिसे न्यायालयों में आसानी से चुनती दी जा सकती थी. ब्लास्ट की प्लानिंग के पुरे सिलसिले में केवल एक व्यक्ति था जो दाऊद से मिला था वो था दाऊद फांसे. दाऊद फांसे एक लैंडिंग एजेंट था जिसने बॉम्बे में RDX की लैंडिंग कराई थी. लैंडिंग करने के बदले में उसे ज्यादा पैसे चाहिए थे जिसके लिए टाइगर ने उसकी मुलाकात दाऊद से कराई थी. पर दाऊद इब्राहिम को ये पता था की ऐसे गवाह की गवाही मान्य नहीं होगी और इस बात के भी कोई सबूत नहीं थे की फानसे की मुलाकात सच में दाऊद से हुई थी.

बड़े वकीलों ने जब उसे ये सलाह दी की उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य पर्याप्त नहीं है उसे दोषी साबित करने के लिए तो दाऊद ने ये निर्णय किया की उसे आत्मसमपर्ण कर देना चाहिए. और इसके लिए उसने भारत से सशर्त आत्मसमर्पण की पेशकश की. दाऊद ने पूरी चालाकी से ब्लास्ट को अंजाम दिया था. उसके खुद को पूरी प्लानिंग में पीछे रखा और टाइगर मेमन को आगे रख कर पूरी घटना को अंजाम दिया. ऐसे में ब्लास्ट केस में उसके बच निकलने की पूरी संभावना थी. दाऊद ने ये शर्त रखी की ब्लास्ट केस के अलावा उसपर कोई और केस नहीं चलाया जाये और दूसरी शर्त ये थी की उसे हाउस अरेस्ट किया जाये.



दाऊद को पता था की इस ब्लास्ट मामले में उसे छोटी मोटी सजा होगी और वो जल्द ही बहार आ जाएगा और वो अपनी अंडरवर्ल्ड की दुनिया को जेल से भी ऑपरेट कर पाएगा. उसे ये भी पता था की मुंबई में खुद को पुनर्स्थापित करने का ये एक सुनहरा अवसर था. ब्लास्ट के बाद मुंबई पर दाऊद की पकड़ कमजोर हुई थी. ब्लास्ट ने धर्म के नाम पर पुरे अंडरवर्ल्ड को २ फाड़ कर दिया था. दाऊद का गुर्गा कमजोर पड़ने लगा था. साथ ही ऐसे भी मान्यता है की दाऊद को अपनी जान का खतरा भी था, ऐसे में अगर दाऊद पुलिस कस्टडी में आ जाता तो उसके लिए मुंबई पर राज करना आसान हो जाता.

हालाँकि भारत सरकार ने ऐसे कोई बात मानाने से इंकार कर दिया और दाऊद के आत्मसमर्पण भी नहीं हो पाया. अगर हमने अपने विवेक का इस्तेमाल कर मुंबई केस में दाऊद को अरेस्ट किया होता तो बाकि सारे संगीन अपराधों में भी दाऊद को घेरना आसान हो जाता. हमने एक सुनेहरा अवसर गवा दिया था.


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