तो क्या हुआ की उसे मार दिया

Nanhe Sipahi | Sep 10, 2017 11:09 AM


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हमारे देश में हत्याएं किसी पीएचडी पेपर से कम नहीं हैं. क्यों कि हमारे यहाँ हत्या के कई प्रकार हैं. आप अक्सर सुनते पाएंगे कि "एक दलित की हत्या कर दी गयी", "केरल में आरएसएस विचारक की हत्या कर दी गयी", "हिंदूवादी शक्तियों के विरूध लिखने पर हत्या कर दी गयी". "एक वामपंथी विचारक की हत्या कर दी गयी" या फिर "गौ हत्या कर दी गयी" . पर एक विशेष प्रकार की हत्या भी की जाती है जिसके मायने न सत्ता पक्ष के लिए बड़े होते है न ही विपक्ष के लिए. ये वो हत्या होती है जो आम तौर पर मेरे और आपके जैसे लोगो की होती हैं. ये "अन्य हत्याएं" की केटेगरी में आती हैं. हम अन्य ही तो हैं.

अगर ७ वर्ष के प्रद्युम्न की हत्या स्कूल में कर दी जाती है तो कोई छाती पीट के नहीं रोयेगा. नहीं रोयेगा. बिलकुल भी नहीं. क्यों कि किसी विचार की हत्या तो नहीं की गयी. किसी दलित की हत्या भी नहीं हुई. किसी वामपंथी को भी इससे नुकसान नहीं हुआ.

वो न ही कोई संघ प्रचारक था. न ही आज़ादी ब्रिगेड का सदस्य. जो मारा वो वोट थोड़े है. वोट बनने में अभी १३ साल का समय बाकि था. फिर अभी से रो के क्या फायदा. कोई ट्वीट भी नहीं करेगा. कोई प्राइम टाइम में नहीं चिल्लाएगा इस पर. राहुल गाँधी हत्यारे का नाम भी नहीं बताएंगे. यहाँ तो सारी जाँच एजेंसियां फेल हो जाएंगी.

कोई बड़ी बात भी तो नहीं है, ७ साल के बच्चे का गला ही तो रेता है, कोई गाय तो नहीं कट गयी. क्या हुआ की बचपन ख़तम कर दिया. दूसरे ने उसपर जवानी तो जी ली. क्या हो गया की एक माँ की गोद से उसके बच्चे को छीन लिया उस स्कूल में अभी भी सैकड़ो बच्चे तो है. सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा. कोई चिल्लाने वाला नहीं. कोई घड़ियाली आंसू भी नहीं बहाएगा. क्यों कि मरने वाला एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार का एक बच्चा ही तो था. अब बिहारी अस्मिता कि बात करने लालू प्रसाद और नितीश कुमार नहीं लड़ेंगे, नहीं लड़ेंगे क्यों कि जिसकी हत्या कर दी गयी वो जातिगत रंजिश में नहीं मरा.



७ साल के बचपन का गला रेतने से पहले उसे दया नहीं आयी? कौन सा जानवर था उसपर? रक्त गिरते समय भी जिसके हाँथ नहीं कांपे, २४ घंटे में उस हत्यारे पर संतई भी छा गयी, तुम कुछ तो छुपा रहे हो.

ये बहुत दुखद है, हम अपनी अपनी राजनैतिक केचुलियों में फंसे है ज्यादा से ज्यादा केंचुलियाँ बदल लेते हैं. पर जो समस्याएं स्थाई हो गयी है है उसका स्थाई समाधान नहीं ढूंढ पा रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा क्या कर लेंगे हम, मोमबत्तियां ही तो जलाएंगे. सड़को पर रोष दिखाएंगे. कितने दिन. सब दब जाएगा. मीडिया भी भूल जाएगा और नहीं भूलेगा तो भी उसे सनसनीखेज़ बना कर कर मनोरंजन करता रहेगा. पर बच्चो पर हो रहे ऐसे अपराधों पर  और अपराधियों पर लगाम कौन लगाए. हम इसे एक स्कूल में हुई घटना भी नहीं मान सकते ये घटनाएं होती रही है. होती रहेंगी. जब तक की राजनैतिक और सामाजिक इच्छा शक्ति न हो इन्हे बंद करने की. तब तक बस इतना सोच कर खुश रहिये की आज शाम आपका बच्चा अपने स्कूल से सही सलामत घर आ गया.


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