तो इसलिए इज़राइल गए थे मोदी

Nanhe Sipahi | Jul 23, 2017 02:07 AM


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भारत और इज़राइल ने 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए और तब से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध आर्थिक, सैन्य, कृषि और राजनीतिक स्तरों पर उभरा है। दोनों देश खुद को अलग-थलग लोकतंत्र के रूप में देखते हैं जो अपने अपने पड़ोसियों द्वारा आतंकवाद, सीज़ फायर उलघन और वर्चस्व की लड़ाई से प्रताड़ित हैं , इसीलिए दोनों देश सामरिक अनिवार्यता के रूप में अपने सहकारी संबंधों को भी देखते हैं।

यरूशलेम और नई दिल्ली के बीच संबंध हमेशा गर्म नहीं थे यद्यपि दोनों देशों को यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता हासिल हुई और लगभग साथ साथ ही कहें दोनों देश आजाद हुए, फिर भी लगभग चार दशकों तक निर्विवाद रूप से दोनों देश अलग दिशाओं में पहुंच गए - भारत को गैर-अलगाववादी आंदोलन में एक नेता के रूप में वैश्विक पहचान मिली जिसने अरब दुनिया और सोवियत संघ के साथ अपना भविष्य देखा वही इज़राइल ने अपने भविष्य को संयुक्त राज्य और पश्चिमी यूरोप के साथ देखा।



लगभग ७ दशकों तक भारत का कोई भी प्रधानमंत्री इज़राइल नहीं गया, ऐसे में आपके मन में ये प्रश्न जरूर उठता होगा की आखिर मोदी ने इज़राइल को क्यों चुना और इस नए सम्बन्ध का विश्व मानचित्र के साथ कैसा ताना बना है. क्या इज़राइल से बनते सम्बन्ध भारतीय उपमहाद्वीप में ड्रैगन और आतंकवाद के कदम रोकने में कारगर होंगे? और अगर होंगे भी तो क्या वजह है की प्रधानमंत्री ने इज़राइल को चुना है. इसे समझने के लिए पहले हमें पाकिस्तान और इज़राइल के सम्बन्धो पर एक नज़र दौड़ानी चाहिए. आपको उत्तर ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएगा.

कैसे हैं पाकिस्तान और इज़राइल के सम्बन्ध -

आप में अधिकतर लोग ये तो जानते होंगे की पाकिस्तान और इज़राइल में सबकुछ ठीक नहीं है पर आपको ये जान कर ताज़्ज़ुब होगा की पाकिस्तान तो इज़राइल को देश ही नहीं मानता. वस्तुतः पाकिस्तान किसी भी स्तर पर इज़राइल को पहचान नहीं देता. इतना ही नहीं पाकिस्तान में छपने वाले विश्वमानचित्र में इज़राइल का कही ज़िक्र भी नहीं होता.

पाकिस्तान और इज़राइल के सम्बन्धो का इतिहास काफी घुमावदार है. शुरुआत के दिनों में पाकिस्तान और इज़राइल के पास एक दूसरे के लिए ज्यादा मुद्दे नहीं थे. पर जाहिर है जब इज़राइल का विस्तार होना शुरू हुआ तो पाकिस्तान को अपने अरेबियन मित्रो के साथ खड़ा होना पड़ा, वो इज़राइल के साथ तो नहीं जा सकते थे. पाकिस्तान के पास कई ऐसे अवसर भी थे जब वो अपने सम्बन्ध इज़राइल के साथ मधुर कर सकते थे, पर जैसे पाकिस्तान की नियत हैं उन्होंने वैसा ही किया. ब्रिगेडियर जिया-उल-हक (जो बाद में सेना प्रमुख और पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने थे) जॉर्डन में पीएलओ विद्रोह के खिलाफ कमान सौंप संभाली। जिसमें तक़रीबन २५००० फिलीस्तीनियों ने अपनी जाने गवाई, जिसमें निर्दोष बच्चे, औरतें, बड़े बुड्ढे और भविस्य की कई नस्लें थी. जिया-उल-हक ने जॉर्डन में पीएलओ आंदोलन को कुचलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. पाकिस्तानियो की इस करवाई को ब्लैक सितम्बर के नाम से जाना जाता है. इस घटना ने फिलीस्तीनियों को पाकिस्तान के विरुद्ध खड़ा कर दिया.

बाद में फिलीस्तीनियों को ये समझने के लिए कि वो इस ऑपरेशन में इज़राइल का साथ नहीं दे रहा था बल्कि जॉर्डन के साथ थे पाकिस्तान ने इज़राइल को एक देश के रूप में मान्यता देने से इंकार कर दिया. पाकिस्तान अपने ऊपर लगे ये इल्जाम झेलने के मूड में नहीं था की वो एक गद्दार देश है और उसने मुसलमानो को मरवाने में दुश्मन देश का साथ दिया है. ऐसे में पाकिस्तान का इज़राइल के विरुद्ध दिखना जरुरी था. पाकिस्तान ने वैसा ही किया. इज़राइल को देश के रूप में मान्यता न देकर पाकिस्तान ने ये साबित करने की कोशिश की कि वो गद्दार नहीं हैं.



बाद में १९७० से १९८० के बीच इज़राइल ने भारत की मदद से पाकिस्तान के परमाणु प्रसार के प्लान का कबाड़ा कर दिया. पाकिस्तान ये बिलकुल बर्दास्त नहीं कर पाया. पहले ही रॉ ने पाकिस्तान के नाक में दम कर रखा था और अब मसूद और रॉ के साथ आ जाने से पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा ही रही थी.

हालाँकि बाद के दशकों में पाकिस्तान एक नुक्लेअर पावर बनने में सक्षम हो पाया पर खैरात में मिले बम ने पाकिस्तान के सर पर नाचना शुरू कर दिया था. इज़राइल और पाकिस्तान के सम्बन्ध कुछ ऐसे हैं जैसे "मैं तुमसे नफरत करता हूँ क्योंकि तुमने उनकी मदद की" और "मैं तुमसे नफरत करता हूं क्योंकि तुमने मेरी मदद नहीं की". ऐसे स्थिति में इज़राइल और पाकिस्तान एक दूसरे के प्राकृतिक शत्रु हुए.

मोदी का इज़राइल दौरा वास्तव में एक मास्टर स्ट्रोक है. मास्टर स्ट्रोक कहना इस लिए जरुरी है क्यों कि पहली बार देश के किसी सरकार ने ये सोचा है कि दोस्त का दुश्मन दोस्त ही होता है. क्यों कि इज़राइल और पाकिस्तान एक दूसरे के धूर विरोधी है ऐसे में दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को साधने में इज़राइल भारत के रस्ते आसान ही करेगा.



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