राष्ट्रवाद के नाम पर

Nanhe Sipahi | Aug 10, 2017 04:08 PM


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सुदीर्घ रजनी अब समाप्त होती जान पड़ती है. महादुख का प्रायः अंत ही प्रतीत होता है. महानिद्रा में निमग्न शव मनो जागृत हो रहा है. इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर धुंधले अतीत की ओर झाँकने का साहस परम्पराओ को भी नहीं होता वहां से एक आवाज़ आ रही है - भारत जाग रहा है. भारत जीवित है.

भारत जीवित है, इस लिए नहीं की सैकड़ो वर्षो की गुलामी और विदेशी आक्रमणों के बाद भी हमनें अपने विरोध के स्वर को मुखर रखा बल्कि इस लिए की हमने अपने अंदर अपने देश में सभी को सभी सम्प्रदायों को, रंग रूप खान पान पहनावे आदि के आधार पर भेद किये बिना लोगो को जीने का अधिकार दिया है, साँस लेने का अधिकार दिया है, अपनी बात रखने का अधिकार दिया है अपने भगवान को मानाने की आज़ादी दी है. हमने हर प्रकार की आज़ादी लोगो में बांटी है, भारत इस लिए ही जीवित है और यही इस देश का राष्ट्रवाद है.

दौर बदल रहा है आज राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा हमें पढाई जा रही है, वो परिभाषा जो देश की परिभाषा कभी थी ही नहीं. हमें बताया जा रहा है की एक देश में एक विशेष सोच रखने वाला ही राष्ट्रवादी है और उसके उलट अगर कोई सोच रहा है तो वो गलत सोच रहा है. मैं इन्हे राष्ट्रवादी नहीं कहूंगा, इन्हे उग्र कहना ठीक होगा, उग्र इस लिए की अहिंसा की भूमि पर अगर एक भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए प्राण गवाने पड़ते हैं है क्यों कि उसका खुदा मेरे भगवान से अलग है तो ये हिंसा देश के लिए तो नहीं हो सकती.



आज देश में २ अलग अलग प्रकार के राष्ट्रवाद पनप रहे हैं, पहला उग्र राष्ट्रवाद और दूसरा छदम राष्ट्रवाद. ऐसा देश के लिए बिलकुल नया नहीं है, ऐसा पहले भी होता रहा है. फर्क इतना आया है कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के इस युग में हर चीज़ आपके पटल तक पहुंचने लगी है, फर्क इतना आया है पुराने भारत में राष्ट्रवादियों के जगह रखी गयी थी, देश के बात करने वालो की ध्वनि को सम्मान दिया जाता था पर धीरे धीरे देश की ये कला लुप्त हो रही है. 

याद कीजिये डा. श्यामा प्रशाद मुखर्जी को. प० जवाहरलाल नेहरू ने इस गैर कांग्रेसी को अपने मंत्री परिषद् में जगह क्यों दी थी. याद कीजिये प० अटल बिहारी वाजपेयी के सदन में दिए भाषण पर नेहरू जी ने क्या कहा था , याद कीजिये श्रीमती इंद्रा गाँधी ने वाजपेयी को भारत बताने यूनाइटेड नेशन क्यों भेजा था और फिर सोचिये की क्या वर्त्तमान परिदृश्य में ऐसा कोई व्यक्ति विपक्ष में बैठा है जो भारत का नेतृत्व कर सकता है, राष्ट्रवाद को जीवित रख सकता है या सरकार में बैठे लोगो के अंदर इतना सामर्थ है की विपक्ष को वही सम्मान दे सके जो पुराने दौर के राजनेताओ ने एक दूसरे को दिए हैं.

राष्ट्रवाद के साथ सबसे बड़ी खूबी यह है कि कोई भी बिना जाने इसे जानने का दावा कर सकता है। 19वीं सदी से पहले तो इसके बारे में कोई जानता ही नहीं था लेकिन पिछले 200 सालों में राष्ट्र और राष्ट्रवाद का स्वरूप उभरता चला गया। इन 200 सालों में राष्ट्रवाद के नाम पर फासीवाद भी आया जब लाखों लोगों को गैस चैंबर में डाल कर मार दिया गया। हमारे ही देश में राष्ट्रवाद का नाम जपते जपते आपात काल भी आया और दुनिया के कई देशों में एकाधिकारवाद जिसे अंग्रेजी में टोटेलिटेरियन स्टेट कहते हैं। जिसमें आप वो नहीं करते जो राज्य और उसके मुखिया को पसंद नहीं।



इतिहास में यह सब हुआ है। राष्ट्रविरोधी बताकर राजनीतिक विरोधियों की हत्याएं हुई हैं। जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को गैस की भट्टी में झोंक दिया गया। ये राष्ट्रवाद के अपने ख़तरे हैं। इन ख़तरों पर हमेशा बात होनी चाहिए तब तो और जब लोग राष्ट्रवाद की खूबियां बघारने में जुटे हों।

अगर सत्ता पर बैठे लोग राष्ट्रवादी होने का नारा जपते हैं तो थोड़ा अजीब लगता है, अजीब इस लिए भी की क्या यही लोग कभी भी और कही भी अपनी पार्टी लाइन से अलग हट कर देश के लिए सोचेंगे, क्या कभी कांग्रेस २जी , ३जी या जीजा जी के विरोध में सडको पर उतरेगी या अगर कोई कांग्रेसी इतनी हिम्मत जुटा भी ले तो कांग्रेस के अंदर उसका कोई वजूद बचता है , क्या बीजेपी के राष्ट्रवादी जो औरो को पाकिस्तान का टिकट थमा रहे है या थमाते रहे हैं व्यापम, ताबूत और किसी विववादस्पद बयान के विरोध में सड़को पर उतरेंगे, ममता बनर्जी के लोग कभी अपनी ही पार्टी के विरोध में चिट फण्ड के राज़ बहार निकलने देंगे, क्या कम्युनिस्ट केरल में आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या के विरोध में तोड़ फोड़ करेंगे, और अगर इन सारे सवालो का उत्तर ना है तो सोचियेगा जरूर की देश के राजनीतिक शक्तियों में राष्ट्रवाद कहाँ बचता है.

राष्ट्रवाद के नाम पर अगर सरकार की विफलता छुपाई जा सकती है तो इसे पनपने दिया जाता है, इसे पनपने दिया जाता इस लिए की विकास की रफ़्तार पर सवाल न हो जाये, नौकरियों की स्थितयों पर सवाल न हो जाये, देश की सुरक्षा पर सवाल न हो जाये. दिक्कत इस बात में भी है कि सरकार के किसी कदम से अगर सरकार पोलिटिकल स्कोर करती है तो विपक्ष सरकार की सराहना नहीं करता, देश के लिए भी अगर कदम उठाये जाये तो पार्टी लाइन पहले आ जाती है, अगर JNU में देश विरोधी नारे फूटते है या जाधवपुर यूनिवर्सिटी में कोई कोहराम होता है तो विपक्ष सरकार के साथ खड़े होने की बजाय ऐसे तत्वों का साथ देता दिखाई देता है जो देश विरोधी हो जाते हैं विरोध के नाम पर, अगर दिल्ली की पार्टी देश की सेना से सबूत मांगे और संसद उस राजनीत की गवाही दे तो सवाल उठना लाज़मी है की राष्ट्रवाद की परिभाषा किसके पास बची है.



देश को समझना पड़ेगा की धर्म और राष्ट्रवाद २ अलग चीज़ें हैं, आप धर्म को राष्ट्रवाद से मत जोड़िये, ये साथ तो चल सकती है पर एक नहीं हो सकती, अगर आप सोचते हैं की देश का एक तबका जो वन्दे मातरम कहने से परहेज़ करता है इस लिए क्यों कि उसका धर्म सबसे ऊपर है तो आप क्या कर रहे हैं, आप भी देश से ऊपर धर्म को रख रहे हैं, बीफ विरोध आप देश के लिए नहीं कर रहे हैं आप अपने धर्म के लिए कर रहे हैं. आप धर्म से ऊपर देश को मत रखिये, धर्म देश के लिए नहीं बनाया गया है, धर्म आपके और मेरे लिए बनाया गया है. देश को देश रहने दीजिये. देश में और भी कई समस्याएं हैं, उन्हें दूर करिये, आप राष्ट्रवादी ख़ुद-ब-ख़ुद बन जाएंगे. हमारे साथ सबसे बड़ी समस्या ये है की हमने राष्ट्रवाद और साम्प्रदाइकता को एक ही समझ लिया है, हमें यही समझ लिया की हिन्दू हितों की बात करना ही राष्ट्रवाद है, हिन्दू हितो की रक्षा करने में कोई बुराई नहीं है पर इसे देश समझ लेना नासमझी है. इस उग्रता से भला किसी का नहीं होना है उल्टा हम ये खाई और बड़ी कर रहे हैं. याद रखिये अगर विशाल रोमन साम्राज्य का अवशेष बचा है, अगर इंग्लैंड की महारानी का सूरज अस्त होने लगता है, जेर्मनी की शक्ति क्षीण हो जाती है और सोवियत संघ अगर बिखर जाता हैं तो इसका कारण उग्र राष्ट्र भी है . आपके और हमारे राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं पर इसका मतलब ये नही कि देश में मतभेद हो जाये. राष्ट्र बनाइये, राष्ट्रवादी आप ख़ुद बन जाएंगे. वही राष्ट्रवाद की परिभाषा होगी.


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