आधुनिक भारत के जनक के लाश को कांग्रेस ने दिल्ली हेडक्वाटर में भी लाने से मना कर दिया था

Kirti Mishra | Aug 21, 2017 12:08 PM


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बात कुछ दिनों पहले की ही है जब मोदी सरकार के नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने  भूतपूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव जो की कांग्रेस  से जुड़े हुए थे  उनको विकास पुरुष कहा  और साथ में इस बात पर भी निराशा जताई की कांग्रेस पार्टी ने कभी भी पी वी नरसिंह राव को उनके किये गए कार्यों के लिए प्रोत्साहित नहीं किया । जबकि वहीं पर मनमोहन सिंह के बारे में हमेशा चर्चा की ।


ये जान के आपको बहुत ही आश्चर्य होगा जब उनका निधन हो गया और उनके परिवार के सदस्य उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में करने की मंशा जताई तो कांग्रेस के तरफ से उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस के हेडक्वाटर में लाने  के लिए मना  कर दिया गया । पांच साल तक केंद्र में कांग्रेस पार्टी जैसी पार्टी के तरफ से सरकार चलने वाले भूतपूर्व प्रधान मंत्री के शव को कांग्रेस के हेडक्वाटर में जगह नहीं दी गयी । ये अपने आप में बहुत ही दुखद और अनोखी घटना है ।



शायद आपको पता नहीं होगा पर उनके प्रधानमंत्री पद पर आने की घटना में काफी रोचक है । देश विदेश की 13 भाषाएँ जानने वाले नरसिह राव दिल्ली छोड़ के जा रहे थे । लेकिन उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था । जब राजीव गाँधी की हत्या हो गयी , कांग्रेस पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन के उभरी । राजीव गाँधी के मौत के बाद सोनिया गाँधी उस समय देश की बाग़डोर अपने हाथ में लेने में सक्षम नहीं थी और पार्टी में प्रधानमंत्री की खोज होने लगी । इसी बीच अर्जुन सिंह ने सोनिया को नरसिंह राव का नाम सुझाया । कांग्रेस को रिमोट से चलने वाले रोबोट की जरुरत थी और अर्जुन सिंह ने राव साहब के गिरते हुए स्वस्थ्य को देख के सोचा की इस काम के लिए राव साहब ही ठीक हैं ।ये अलग बात है की अपने कार्यकाल में राव साहब ने जिन चुनौतियों का सामना किया वो देखने लायक था ।

नरसिंह राव पहले प्रधानमंत्री थे जो दक्षिण भारत से आये  थे ।वो बहुत ही जल्द अपने कार्यों से सबको गलत साबित करने लगे और सोनिया के वफादारों के आँखों की किरकिरी बन गए । जब सोवियत संघ के विघटन के बाद देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गयी और देश दिवालिया होने की कगार पर था । उस समय वर्ल्ड बैंक से उधार लेने के लिए देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा । राव ने नेहरू के समाजवादी अर्थव्यवस्था से किनारा किया , रूपये का अवमूल्यन किया और लाइसेंस राज खत्म किया ।

आज हमारे प्रधानमन्त्री दुनिया भर में हमारे भारतीय बाजारों का जो ताल ठोकते फिरते हैं उसका टाला खोलने का श्रेय राव साहब को ही जाता है । यही नहीं रक्षा और विदेशी नीतियों में भी राव साहब का बहुत बड़ा हाथ है । आज सबसे बड़े  रणनीति साझेदार  इजराइल के साथ जो सम्बन्ध है उसे भी 1992 में राव साहब के कार्यकाल में की रखा गया था   ।

बात 1994 की है जब pakistaan  ने इस्लामिक देशों के समूहों के जरिये  भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग में घेरने का पूरा इंतजाम कर लिया था । कश्मीर में मानवाधिकारों के उलंघन का ये आरोप अगर भारत पर साबित हो जाता तो संयुक्त राष्ट्र संघ भारत पर बहुत सारी पाबन्दी तो लगा ही देता साथ ही साथ कश्मीर के मुद्दे का भी अन्तराष्ट्रीयकरण हो जाता । उस समय राव साहब ने बहुत ही धैर्य का परिचय दिया और अपने पार्टी से ऊपर उठ कर  श्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ मिल कर एक एक चाल बहुत ही सावधानी से चली ।उन्होंने जिनेवा में में भारत के तरफ से एक दल भेजा जिसका मुखिया बाजपेयी जी को बनाया उस दल में कश्मीर के पूर्व  मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला को भी शमिल किया ।


जहाँ उन्होंने इतनी उम्दा राजनीतिज्ञ गुण दिखाए वहीँ उनपर कई आरोप भी लगाए गए। जिनमे से एक मामले में उन्हें २ साल की जेल भी हुई । वहीँ आनंद माथुर ने उन्हें विश्वश्घाती भी कह दिया उनका कहना है की सॉलिटर जनरल बनना लगभग तय था पर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के पहले की राव साहब ने आनंद माथुर को गृह मंत्री से मानव संसाधन मंत्री के पद पर नियुक्त करने की बात कह दी ।

कांग्रेस भले ही नरसिंह राव से कितना भी किनारा कर ले ,पर उन्हें नए भारत का जनक कहना गलत नहीं होगा ।


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