नीतीश ने इस्तीफा प्रधानमंत्री पद से भी तो दिया है.

Nanhe Sipahi | Jul 28, 2017 04:07 PM


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अभी २ दिन पहले बिहार की राजनित पुरे उबाल पर थी. बिहार के मुख्यमंत्री श्री नितीश कुमार ने महागठबंधन की सरकार गिरा दी और भाजपा के साथ नए गठबंधन की रचना की. नितीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा की वो भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं करने वाले हैं और साम्प्रदाइकता के नाम पद हो रहे भ्रष्टाचार को वो बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं और ऐसे सरकार चलने का उन्हें कोई फायदा नहीं दीखता जो सिर्फ एक परिवार को बचने के लिए बनी और चल रहे हैं.

आपको जैसा की ज्ञात है की बिहार का यादव परिवार इन दिनों अपने भ्रष्टाचार की वजह से चर्चा में है- ED , सीबीआई और इनकम टैक्स के छापो ने लालू परिवार की हवा निकाल रखी हैं ऐसे में नितीश कुमार की छवि को गहरा झटका लग रहा था और नितीश कुमार अपने आगे की राजनित लालू परिवार के साथ तो कम से कम नहीं देख पा रहे थे. वैसे अगर गौर से देखें तो नितीश कुमार के भाजपा के पाले में आ जाने से विपक्ष के पास ऐसा कोई चेहरा नही बचा है जो २०१९ में मोदी को चुनौती दे सके.




नितीश NDA छोड़ विपक्ष में इस लिए गए थे क्यों कि उनकी महत्वकांछा मुख्यमंत्री के पद से आगे की थी. याद कीजिये २०१४ का आम चुनाव. उस चुनाव में कितने प्रधानमंत्री पद के प्रत्यासी थे. देश का यही मानना था की अगर भाजपा २७२ के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाएगी तब ये चेहरे किंग मेकर बनेगे. जैसा की १९९८ वाले चुनाव में एच डी देवेगौडा, इंद्रा कुमार गुजराल की किस्मत चमकी थी वैसे ही २०१४ के चुनाव में केजरीवाल, मुलायम या नितीश प्रधानमंत्री पद तक पहुंच सकते थे. पर जो कुछ हुआ वो इतिहास ही है. न केवल NDA बल्कि एक अकेली भाजपा ने राजनित के इन सारे दुरन्धरों को पानी पिलाया. और कितने ही सपने सदा के लिए धराशाई हो गए. फिर बाद में मोदी के विजय रथ को इन्हे छत्रपों ने अपने अपने राज्यों में थामा भी. दिल्ली में केजरीवाल, बिहार में नितीश और बंगाल में ममता ने विपक्षी एकता को लामबंद किया.

हालाँकि ये विपक्ष कभी एक दूसरे का हो नहीं पाया, नोटेबंदी वाले मुद्दे पर तो ममता ने नितीश को गद्दार तक कह दिया था. खैर बात जो भी रही हो इतना तो साफ़ है की कांग्रेस राहुल गाँधी के अलावा किसी और को प्रधानमंत्री पद देना नहीं चाहती और विपक्ष ये जनता है की राहुल गाँधी तत्कालीन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री भी बन नहीं सकते. राहुल गाँधी अभी क्षत्रिये पार्टी वाली भूमिका में है और ममता बंगाल दंगो के दाग धोने में लगी है. केजरीवाल को कपिल मिश्रा ने लाइन पर ला दिया है और वो इन दिनों गुमसुम से ही दिखाई देते हैं. यहाँ तक की नितीश के भाजपा के साथ जाने पर भी शायद ही वो कुछ बोले होंगे ऐसे में ये तो साफ़ है की विपक्ष अब बस दिखावा भर रह गया है.



ऐसे में अगर नितीश ये सोच रहे हैं की २०१९ न सही कभी और सही तो इसमें कोई गलती नहीं है, वैसे नितीश कुमार का महागठबंध से बाहर आना और भाजपा के साथ जाना मोदी की स्वीकारोक्ति ही है और ऐसे में इतना तो मान ही लिया जाना चाहिए की २०१९ में प्रधानमंत्री बनाने के सपने को नितीश ने तिलांजलि दे दी है. सच कहे तो नितीश ने प्रधानमंत्री पद से भी त्यागपत्र दे दिया हैं.


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