बदले दौर की बदली ममता

Nanhe Sipahi | Jul 10, 2017 08:07 PM


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हम उदासीनता के नए युग में हैं. उस युग में जब इंसान ही इंसान के रक्त का प्यासा है. हमें भेड़ियों की जरुरत ही नहीं है. इंसान ही काफी है. अभी बंगाल जल रहा है. कुछ दिनों पहले असम भी जल रहा था और उसके पहले उत्तरप्रदेश और ये फेहरिस्त बड़ी लम्बी है. हम उस दौर में है जहा सियासत जिंदगी से बड़ी है. ये वो दौर है जहा रक्त अपना चरित्र दिखा रहा है और इंसान अपना. ये वो दौर भी है जहा प्रदेश से देश साधने के कोशिशे हैं और खुद को सबसे बड़ा विपक्ष बनाने की. हम उस दौर में जब अपनी जीत पर काम बोलता है और अपनी हार पर सम्प्रदईकता बोलती है. जलता बंगाल तो इसका ज्वलंत उदाहरण है.



अगर ममता बनर्जी की उदासीनता की नहीं तो अकर्मण्यता का उदाहरण तो बंगाल है ही.

जहा तक हमें पता है की इस दफा एक फेसबुक पोस्ट ने बंगाल को जलाया है. हो सकता है ये सच हो की उस पोस्ट पर ऐसे बातें लिखी गयी जो किसी खास समुदाय को नाखुश करती है. और ये भी हो सकता है इस पोस्ट के फलस्वरूप ये प्रतिक्रिया हुई हो लेकिन अपनी नाकामी को केंद्र के माथे पर मड देना बंगाल की ममता की विफलता ही है. एक बार ये मान भी लिया जाये की इन दंगो में बीजेपी की भूमिका है पर क्या ममता का तंत्र और उनकी सरकार इतनी कमजोर है की ऐसे बृहद पैमाने पर हो रहे दंगो पर वो लगाम नहीं लगा पायी. या फिर नेपथ्य में कुछ और ही हुआ है. आज बंगाल में ३५% फीसदी की जनसँख्या में एक खास समुदाय रहते हैं. और ममता की राजनित ऐसा लगता है बस उसी दायरे में सिमटती जा रही है.

एक दौर था जब ममता को बंगाल की शेरनी कहते थे, कम्युनिस्टों के आतंक को झेलती ममता अकेले ऐसी आवाज़ थी जो बंगाल को सही मायनो में दिल्ली में स्थापित करती थी. पर अब दौर बदल चूका है. ममता की राजनित भी बदल चुकी है. आश्चर्य तब होता है जब उनकी सरकार में इतना समर्थ तो होता है कुछ नेताओ को एक विशेष जगह पर जाने से रोक दिया जाता है पर वही ममता एक समुदाय विशेष के पागलपन को रोक नहीं पाती. मतलब साफ है ये एक अलग तरह की राजनित है जहा एक वर्ग वोट बैंक है और बंगाल वो जंग का मैदान जहा दोनों ओर के सिपाही भी अपने है.

हमारे देश में राजनित के अलग अलग तराजू हैं - मुझे याद है जब गुजरात में दंगे हुए थे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफा मांगने वाले को लिस्ट बहुत लम्बी थी. ये भी एक सच है उसके बाद गुजरात मुख्यतः शांत ही रहा और एक २ घटनाओ को छोड़ दिया जाये तो गुजरात में दंगे न के बराबर हुए. पर बंगाल की तासीर अलग है. पिछले ३ साल में बंगाल में कई दंगे हुए पर ममता सिंहासन पर विराजमान हैं. और वो विपक्ष जो बात बात में मोदी सरकार से इस्तीफा मांगता था आज ममता के साथ खड़ा है.



आरोप भी बीजेपी पर ही लगा दिए की दंगो के कारण बीजेपी की साम्प्रदाइक हरकते हैं. हम ये नहीं जानते की इसमें बीजेपी का हाँथ है या नहीं पर हमें इतना पता है की विपक्ष के पास शायद अपनी सीबीआई है जिसने उन्हें बता दिया है की इसके पीछे कौन है. बहरहाल मैं इस देश का आम इंसान हूँ और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की केंद्र में मोदी सरकार है या राज्य में कोई और है मुझे फर्क इससे पड़ता है की क्या एक बेहूदे पोस्ट और उनके बाद के पागलपन के बिच क्या मैं ज़िंदा रहूँगा. क्या मेरा भाई,मेरा परिवार सुरक्षित रहेंगे. मुझे फर्क इससे पड़ता है की क्या देश के किसी कोने में मैं जाऊ, तो सुरक्षित रह पाउँगा?

हम तुस्टीकरण के उस दौर में हैं जहा हमारे नेताओ को देश द्रोही नारे लगाने वालो से, कश्मीर जलाने वालो से, बंगाल जलानेवालो से, मुंबई दहलाने वालो से सहानुभूति तो है पर देश के लिए लड़ने मरने वालो से सबूत मांगे जा रहे हैं. अब तय आपको करना है.



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