कश्मीर कहता है राहुल को दवा और दुआ दोनों की जरुरत है

Nanhe Sipahi | Jul 22, 2017 11:07 AM


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मैं अक्सर बचपन के दिनों में स्कूल के बाद गर्मियों की छुट्टियों में अपने नानी के घर जाया करता था, बड़ा आनद था. मेरी नानी का घर इटली में नहीं था और हम तो राज्य परिवहन की बसों में ३ सीट पर ५ लोग बैठ के जाया करते थे. हाँ जब छुट्टिया ख़तम होती थी तो हमें सबसे बड़ा डर इस बात का होता था कि अब फिर से स्कूल जाना पड़ेगा. पिछली छमाही में पढ़ाये गए आधी से ज्यादा चीज़ें हम भूल चुके होते थे या फिर जैसे हनुमान चालीसा का पाठ करके हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाई जाती है वैसे ही हमारे शिक्षक महोदय हमें पीट पीट कर पुराने पाठ याद दिलाते थे. अगर आप अपनी भावनाओ को थोड़ा नियंत्रण में रखें और अपने गणित के घोड़े दौड़ाये तो आप पाएंगे की राहुल गाँधी की हालत मेरी परिस्थितियों से कुछ मिलती जुलती ही है. राहुल गाँधी भी अभी अभी नानी के घर छुट्टियां बिता के लौटे हैं - इटली से. और तो और आम औसत विद्यार्थियों की तरह पिछली पढाई भूल चुके हैं. आप सोच रहे होंगे की मैं ऐसे किस आधार पर कह रहा हूँ, अब सोचिये की अगर आपसे कोई पूछे की कश्मीर समस्या की शुरुआत कब हुई तो भले ही आप ये न बता पाएं पर इतना तो आपको भी पता होगा की आतंकवाद की शुरुआत 90 वाले दशक में हो चुकी थी.

अब कल राहुल गाँधी अचानक कही से दर्शन देने पहुंचे और बम फोड़ दिया. राहुल गाँधी ने कहा कि ये मोदी जी कि गलत नीतियां है जिससे आज कश्मीर सुलग रहा है. ध्यान से सुनिए गलत नीतियां. लगभग ६ दशकों से दिल्ली कि गद्दी कोंग्रेसियों ने गर्म की. 6 दशक मतलब कितने ही भारतियों की औसत उम्र. इतने सालो में अगर आप कश्मीर समस्या का हल नहीं ढूंढ पाए तो नीतियां किसकी गलत रही ये बताने की जरुरत नहीं है. अपने पिताजी के माताजी के पिताजी की पैदा की हुई समस्या को आप अगर अपने राजनैतिक फायदे के लिए किसी के ऊपर थोप दें तो या तो आप में सच बोलने की हिम्मत नहीं है या फिर आप अपने पुराने पाठ भूल गए हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर समस्या को ले जाने की बात करके पूर्वजो ने आतंक के पनाहगाहों को छाती पीटने का मौका आपने नहीं तो विरासतों ने तो दिया ही है. और कश्मीर आज सुलग रहा है तो इस लिए क्यों कि बुरहान वानी को मार कर आतंकवाद कि धार को कुंद करने की कोशिश की गयी है. न की पिछली कई सरकारों की तरह (वाजपेयी की सरकार को मिला के ) इस सरकार ने आत्मसर्पण कर दिया है. मोदी ने २०१४ के चुनाव से पहले ही देश को ये तय करने को कह दिया था की पाकिस्तान दोस्त या दुश्मन. और आज जब देश ने तय किया है तो सेना दुश्मनो से बराबर लोहा ले रही है. इसमें गलत क्या है. अगर मोदी सरकार की कश्मीर निति गलत है तो राहुल को बताना चाहिए की वो किस विशेष निति की बात कर रहे हैं. मणि शंकार ऐय्यर वाली?


कश्मीर इस इंडिया, इंडिया इस कश्मीर तो आप ऐसे बोल गए जैसे ८० के दशक में इंदिरा इस इंडिया और इंडिया इस इंदिरा वाला डायलॉग था. आपको हम पहले ही बता चुके हैं है की छुट्टियां मानाने से ऐसा होता है. वैसे राहुल गाँधी की पार्ट टाइम पॉलिटिक्स से देश को नुक्सान तो हो ही रहा है. राहुल गाँधी ये तय नहीं कर पा रहे हैं की सरकार का विरोध करना और देशहित का विरोध करने में फर्क है. आपकी सियासी दूरियां हो सकती है. मनमुटाव भी हो सकता है पर सरकार का साथ देने का सामर्थ अब ढूंढने से भी नहीं मिलता.



आपको असहमति का हाँथ उठाने का अधिकार तो है पर जब देश का एक प्रान्त जल रहा है और आप उस पर रोटियां सकें इसका तो अधिकार आपको नहीं है. बीते सालो में हमारे देश की राजनित अवसरवादी तो हो ही गयी है. और ये सभी राजनैतिक पक्षों के लिए लागु होता है. इसके कई प्रमाण मैं दे सकता हूँ. याद कीजिये जब 1962 की लड़ाई चीन से हारे थे. तब कांग्रेस से चुने हुए राष्ट्रकवि दिनकर ने खुल कर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर नेहरू की नीतियों की आलोचना की थी. ये साहस तब के कांग्रेस में था और उसे सुनने का साहस तब के प्रधानमंत्री में भी था, दिनकर ने संसद के पटल पर कहा था -

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ , जाने दो इसको स्वर्ग धीर
पर फिरा हमें गांडीव गदा , लौटा दे अर्जुन भीम वीर
कह दे शंकर से आज करें, वो प्रलय नृत्य फिर एक बार
सारे भारत में में गूंज उठे , हर हर बम का महू-उच्चार.

ये अलग बात है कि अब के तथाकथिक सेक्युलर ब्रिगेड इसको साम्प्रदाइक रंग जरूर दे देती की जब देश में भारत माता की जय बोलने पर विवाद है वहाँ आप "सारे भारत में में गूंज उठे , हर हर बम का महू-उच्चार" कैसे कह सकते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले चीन ने एक बयान दिया की भारत की हिन्दू निति के कारण ही भारत और चीन के सम्बन्ध खराब हो रहे हैं. आप गौर से देखिये तो ऐसे बयान का मतलब साफ़ था. चीन जानता है कि ऐसा कहने से कांग्रेसी और कम्युनिस्ट मिले सुर मेरा तुम्हारा हो जाएंगे साथ ही भारत का एक बड़ा मुस्लिम वर्ग भी उनके साथ हो लेगा ऐसा कर के वो हिंदुस्तान और हिंदुस्तान की सरकार को कमजोर कर पाएंगे. और आश्चर्य जनक बात ये हैं की वैसा होता दिखा भी. अगर राहुल गाँधी ये बयान देते हैं कि कश्मीर में लगी आग की वजह नरेंद्र मोदी हैं तो ये देश की सेना का मनोबल गिराने जैसा ही तो है. अगर राहुल गाँधी ये कहते की हम सरकार से चाहते हैं की कश्मीर शांत हो और हम आपको सहयोग देते है तो निश्चित ही राहुल का कद और बड़ा होता पर किसी के हाँथ की कठपुतली बन कर निश्चित ही आप बदलाव तो नहीं ला सकते हैं. आप एक वर्ग का तुष्टिकरण तो कर लेंगे पर ऐसे बयानों से आप देश का मनोबल निचे ही तो कर रहे हैं.

वर्तमान में राहुल मुझे देश के लिए तैयार तो नहीं दिखते, उनकी राजनित देश के कई क्षेत्रीय दलों जैसी हो गयी है. कम से कम पहले की कांग्रेस ऐसी नहीं थी. हमनें सामर्थ देखा था. इंदिरा गाँधी और लाल बहादुर ज्वलंत उदहारण हैं. लाल बहादुर को इस लिए ह्रदय आघात आया क्यों कि वो अपनी आलोचना जो ताशकंद समझौते क़े बाद हुई थी उसे झेल नहीं सके या उससे पहले पाकिस्तान को उसकी औकात बताना भी लाल बहादुर क़े सामर्थ में था. इंदिरा ने भी अमेरिका, चीन और ब्रिटैन क़े दवाब में न आते हुए पाकिस्तान क़े २ टुकड़े कर डाले थे. आज वो सामर्थ नहीं दिखता. देश पर राजनित हावी होती जा रही.


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