जो डर गया समझो मर गया

Nanhe Sipahi | Aug 19, 2017 03:08 PM


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जो डर गया समझो मर गया, बहुत पुरानी बात है, पर सटीक है. अब दूसरे तरीके का डर देखिये - सो जा बेटा वर्ना गब्बर सिंह आ जाएगा. आया ? भले ही नहीं आया पर बेटा सो गया. बात समझ आयी ? डर के २ ही निष्कर्ष होते हैं, या तो इंसान सो जाता है या मर जाता है. हमारी स्थिति भी ज्यादा अलग नहीं है. हम सब डरे हुए हैं. सबके सब. डर का एकछत्र राज़ है. डरना एक प्रजातान्त्रिक मूल्य है.

मुर्दे कभी नहीं डरते, डरने के लिए कुछ बचे तब तो. डर वही से आता है जहा से निर्भयता आती है. स्थिति बड़ी विचित्र है, पुलिस हो या गुंडे एक दूसरे से डरे हुए हैं. नेता और जनता भी एक दूसरे से डरे हुए हैं. पाकिस्तान, पाकिस्तान से डरा हुआ है, चीन हमें डरा रहा है और हम बॉलीवुड से एक्टिंग उधर लिए घूम रहे हैं.
हम देश की जनता है कल तक २जी, कॉमनवैल्थ से डरे हुए थे अब अच्छे दिन से डरे हुए है. अच्छे दिन में नोटेबंदी, GST और बहुत कुछ आता है, मिलता नहीं है. ये अलग प्रकार का डर है. डर पराकाष्ठा पर है बच्चो को देखिये ऑक्सीजन से डरे हुए हैं. ऑक्सीजन सप्लाई करने वाले (ऊपर और निचे वाले दोनों) पहले ही डर के मारे भागे हुए हैं. सबसे बड़ी बात ऑक्सीजन से स्वास्थ्यमंत्री भी डरे हुए हैं. डर एक दम मकड़ी जाल हो गया है. पाकिस्तान डर के बारे २-३ जवान मार दे रहा है और हम आत्मसम्मान मार दे रहे हैं. मुझे लगता है हमारे विश्वविद्यालयों में डर पर पीएचडी की जानी चाहिए. चैनल वालो को TRP के लिए परमानेंट वाला मुद्दा भी वही से मिल जाएगा, वैसे डर ही तो बेच रहे हैं सब चैनल पर भी. डराते रहो. डरो क्यों की तुम ऐसा बोलेगे तो फतवा निकल जाएगा. ऐसा करोगे तो धर्म खतरे में पड़ जाएगा.हम से तो अच्छा कोला वाला सब है- सच तो बोलता है की डर के आगे जीत हैं.




डर बहुत ही सामान्य मानविक क्रिया है, प्रतिक्रिया ही उसका उपाय है, निष्क्रियता तो बिलकुल नहीं. पर हम तो दूसरा वाला ऑप्शन ले रखे हैं, निष्क्रियता वाला. निष्क्रिय जो जाओ, शुतुरमुर्ग की तरह सिर जमीन में धसा लो, सोच लो की सब ठीक है (गाँधी जी वाले बन्दर का उदाहरण नहीं देंगे, मुझे भी डर है). बस फिर क्या सोच ही लिया सब ठीक है तो बहस ही नहीं बचता है, २१वी सदी में देश में मंगल न सही पर हम मंगल ढूंढ रहे हैं. एक दम निष्क्रिय, बिहार डूब रहा है हम सेल्फी ले रहे हैं, महिला लूटी जा रही है, हम बहस कर रहे हैं की क्या नहीं करना चाहिए था, रोटी नहीं पर थाली के दाम तय किये जा रहे हैं, गर्व की बात है, ७० साल में देश को आप पूरा अन्न नहीं दे पाए, और आज दम्भ की १० रुपये में थाली खिला रहे हैं. हम क्यों बोलेंगे, मुर्दा बोलता नहीं है, सोते को बोलते देखा है. डर नाच रहा है, बोल देंगे तो सब कुछ खतरे में पड़ जाएगा. डर है.


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