बहुत मायने है भारत अमेरिका के नए सम्बन्धो के

Nanhe Sipahi | Sep 03, 2017 09:09 AM


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भारत और अमेरिका के संबंधों की अगर बात की जाये तो उन्हें कभी नीम नीम ,और कभी शहद कहना गलत नहीं होगा । अगर भारत और अमेरिका के राजनितिक संबंधों को देखा जाये तो इस समबन्ध की उम्र 65 सालों की हो चुकी है और इन 65 सालों में काफी उतार  चढाव भी देखने को मिले  । इन 65 सालों में 26 बार भारतीय प्रधानमंत्री और एक भारतीय राट्रपति अमेरिका जा चुके हैं ,जबकि 6 बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये हैं ।भारत के आजादी के बाद भारत अमेरिका के राजनितिक पटल पर काफी हलचल देखने को मिलती है । कभी शीतयुद्ध तो कभी अविश्वाश या फिर कभी भारत के परमाणु कार्यक्रम को ले कर जो खिचाव आये उन्हें साफ़ तौर पर देखा जा सकता है ।

1971 जब भारत -पकिस्तान में तीसरा युद्ध हुआ उस समय अमेरिका ने चीन के साथ मिल कर पकिस्तान का सहयोग किया । जिससे भारत में अमेरिका को ले कर काफी निराशा फ़ैल गयी । यही नहीं जब 1974 में भारत में परमाणु परिक्षण किया तब अमेरिका ने नुक्लेअर प्लांट की मांग करनी शुरू कर दी जिसके लिए भारत ने साफ़ तौर पर इंकार कर दिया और इस इंकार के बाद अमेरिका ने भारत से सभी प्रकार के परमाणु सहयोग ख़तम कर लिए । एक समय तो ऐसा भी आया था जब ऐसा लगा जैसे भारत और पकिस्तान में परमाणु युद्ध हो कर ही रहेगा पर किसी प्रकार उसे टाला गया ।

पर अगर इनसब से ऊपर उठ कर हम अगर भारत और अमेरिका के वर्तमान संबंधों पर नजर डालेंगे तो देखेंगे की प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने से अब तक विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और प्रधानमंत्री मोदी के सूझबूझ और कूटनीति प्रयासों से भारतीय विदेश नीतिओं को न सिर्फ नया आयाम मिला है बल्कि विश्व पटल पर भारत के आर्थिक और  राजनितिक मजबूती भी मिली है । अपने दो साल के कार्यकाल में 4 बार अमेरिका जाने वाले P M मोदी ने अमेरिका के सामने विश्व के अन्य देशों और भारत के लिए होने वाले चुनौतियों और opportunity का भी जिक्र करते हैं ।आज अमेरिका जो भारत को छोड़ पकिस्तान का साथ देता था, वही  आज आतंकवाद के मामले में पकिस्तान के विरोध में खड़ा है  ।ये बात तो प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अमेरिकी संसद में दी गयी भाषणों से साफ़ पता चलती है ।



जब मोदी जी अमेरिकी संसद को सम्बोधित कर रहे थे तो उनके कहे गए बातों के दौरान अमेरिकी सांसदों ने 9 बार खड़े हो कर तालियां बजाई और तालियों की आवाज से अमेरिकी संसद गहगहा उठी ।ये देख के इतना तो समझ में आता है की भारत अमेरिका के सामने कोई याचक नहीं जो मदद के लिए हाथ फैलाये खड़ा है बल्कि आँखों से आंख मिला का खड़ा होने वाला सहयोगी मित्र बन चूका है । कुछ लोगों द्वारा यह भी कहा जा रहा है की अमेरिका जो भी करता है अपने लाभ के लिए करता है ,हाँ सच है ये और इसमें अमेरिका का रुख गलत भी नहीं है क्योंकि किसी भी सफल विदेश निति  तभी फूलती फलती है जब उसका उद्देश्य राष्ट्रहित से जुड़ा हुआ हो ।तो बात है की जब अमेरिका को भारतीय बाजार चाहिए तो भारत भी विश्व के मंचों पर अपनी मजबूत करने के लिए तत्पर है ।

प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के मजबूत सम्बन्ध आज किसी से छिपे हुए नहीं हैं ,और इन मजबूत संबंधों का उदाहरण हमारे सामने है जब अमेरिका ने भारत के साथ रक्षा 
सहयोग बढ़ाये जाने का प्रस्ताव रखा  । वहीँ अमेरिका के एक शीर्ष सीनेटर ने भारत को अत्याधुनिक ड्रोन बेचे जाने की जोरदार वकालत की और इसका कारण भी रक्षा सहयोग को ही बताया । भारत और अमेरिका के अच्छे संबंधों का एक फायदा अमेरिका में रह रहे भारतियों को भी मिला जब ओबामा ने ऐलान किया की बिना वाजिब दस्तावेज अमेरिका में रह रहे NRI को तीन साल का वर्क परमिट मिलेगा ।



आज अमेरिका को भी भारत के मजबूती का एहसास हो चूका है यही कारण है की भारत और अमेरिका के सम्बन्ध में आज न तो पकिस्तान और न ही चीन की जरुरत है । जैसे ही मोदी ने ओबामा के साथ हाथ मिलाया शरीफ खुद ब खुद अकेले हो गए ।अब राजनीती के इस कूटनीति गुण तो कोई मोदी जी से ही सिख सकता है ।


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