मैं बिहार हूँ |

Nanhe sipahi | Jul 09, 2017 12:07 AM


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आज कमजोर हूँ, लचर हूँ, लाचार हूँ . मैं बिहार हूँ . आपने अगर गंगा के पानी को महसूस नहीं किया . लकड़ी ने नावों में बैठ कर पटना के घाटों को नहीं देखा तो मैं कह सकता हूँ आपने बिहार नहीं देखा, आपने मुझे नहीं देखा क्यों कि हर ज़र्रे में में जहा बनारस घुलता है, जहा से शुरू होता है मैं वही बिहार हूँ. आपने घाटों पर सूर्य को अर्घ पड़ते नहीं देखा, विश्व के दूसरे सबसे बड़े पुल को नदी के ऊपर से दौड़ते नहीं देखा तो आपने बिहार नहीं देखा है. आपने बस वही देखा जो दिखाया गया. आपने मेरा दर्द देखा है, मेरी पीड़ा देखी है आपने मुझे नहीं देखा. भारत के झंडे में उगते अशोक चक्र को सलाम भले ही भारत को करते हैं पर उस भारत की एक अनकही पहचान मैं हूँ, सुनहरे भूत और ध्वस्त होते वर्त्तमान के बिच में जो बसा है वो मैं ही तो हूँ, जी हाँ मैं बिहार हूँ.

लोगो ने पथभ्रष्ट राजनेताओ से मुझे पहचान दी है, मेरे लोगो को मजाक की तरह, गालियों की तरह बिहारी कह कर सम्बोधित किया है, मेरी गरीबी और उपेक्षाओ से मुझे पहचान दी है, मैं वो नहीं हूँ जिसे आप जानते हैं, मैं तो वो हूँ जिसे पूरा विश्व जनता है, नालंदा के ढूह में जो ज्ञान बसा है, गया के महाबोधि के निचे जो बुद्ध बसा है, महाभारत की जन्म भूमि मैं हूँ. और अगर आप ये नहीं जानते तो आप मुझे भी नहीं जानते, आप दावा भी नहीं कर सकते की आप मुझे जान पाएंगे, मैं वो हूँ जो आपके दायरे आपकी पहुंच से बहुत दूर हूँ, मैं बिहार हूँ |





मुगलों की इमारतों का शौख बहुतो ने पाले है, कुछ ने तो दिल्ली दरबार भी जमाई है उसी नाम पर, पर मेरे बिना सब अधूरे हैं दिल्ली का रास्ता मेरे दिल से निकलता है मेरे घर से, हिंदुस्तान का इतिहास मेरे जिक्र के बिना अधूरा है, अशोक को कैसे भूल जाएंगे आप या फिर अगस्त की क्रांति को, हिंदुस्तान को ३ दिन की सबसे पहली आज़ादी दिलाने वाला मैं हूँ और अगर आप ये सब नहीं जानते तो आप बिहार को नहीं जानते. आप बस उन्हें जानते हैं जो बीमार है, जिनकी मेरे लोगो के बीच कोई पहचान नहीं आप उन्हें देखिये जिससे देश को पहचान मिली. अगर राजेंद्र बाबू में देश ने पहला फर्स्ट सिटीजन देखा तो वो मैं हूँ, गाँधी ने मेरी भूमि से अंग्रेज़ो को साधा वो मैं हूँ, चंद्रशेखर आज़ाद को जहा पनाह मिली वो मैं हूँ, इंदिरा के सिंहासन को जिसने हिलाया वो मैं हूँ, मैं बिहार हूँ.

आज के दौर के अराजक राजनीतिज्ञों को मत देखिये वो मेरी पहचान कब बन गए मुझे पता ही नहीं चला. मेरी पहचान परिवारवाद से मत करिये, समाजवाद की परिभाषा भले ही पाओ या आधा किलो हम दे देंगे. हमारे यहाँ समाजवाद, यादववाद कब बन गया मुझे नहीं पता, पर जेपी के नरो को किसी ने समझा तो वो मैं हूँ, भूदान की भूमि और गुरु गोविन्द सिंह जी का तीर्थस्थल मैं ही तो हूँ. स्कूलों के वो ७ बच्चे जब अंग्रेज़ो के आगे कूद जाते हैं तो वो मैं हूँ. आप जिस आज़ादी से हमें मापते हैं उस आज़ादी का जनक मैं हूँ. दिल्ली की गाडी जिस हिंदी पट्टी से गुजरती है वो मैं हूँ. कर्पूरी ठाकुर की पत्नी जब खेतो में काम करते निमोनिआ से मर जाती है तो वो मैं हूँ, चारा घोटाला, ज़मीन घोटाला और कई दूसरे अपराधों से मुझे मत मापिए, अगर पैमाना लगाना ही है तो इस बात पर लगाइये की मूलभूत सुविधाओं और ज़रूरतों के बिना भी अगर हम IAS फैक्ट्री हैं तो इस ज़मीन में कुछ तो है. गंगा, कोशी और गंडक नदियों ने मेरी ज़मीन को दुनिया की सबसे उपजाऊ ज़मीनो में ला खड़ा किया है, हमारे यहाँ किसान आंदोलन नहीं करता, स्ट्राइक नहीं करता, आत्महत्या नहीं करता गरीबी चाहे कितनी भी हो, वही करता है जो हमारी ज़मीन उससे करने को कहती है. इस उपजाऊ ज़मीन से आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर्स IITians की फसलें लगती रहेगी और अगर आप फिर भी हिसाब नहीं कर पा रहे, तो आप बिहार नहीं साध पाएंगे. आप बस हमारे नेताओ को साधते रहेंगे , आप मुझसे , मेरी ज़मीन से खासे दूर ही रहेंगे.



हम मानते हैं हमारे अंदर भी कमियां है किस में नहीं होती, आपके यहाँ अपराध मेरे प्रदेश से कही ज्यादा है, हम आंध्र प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा ग्रेजुएट देते हैं. शिक्षा के मामले में हम केरल से आगे. हमें मापना हैं तो ऐसे चीज़ों से नापिये, हाँ रोज़गार नहीं है हमारे पास, इस लिए दुसरे शहरों में है, कहा जाये ? भूखे मरें?. या देश के लिए मानव संसाधन बने. मुझे मेरे कार्य से पहचानिये, मेरी क्षमता से पहचानिये, मेरी कला से, मेरे ज्ञान से मुझे पहचानिये. जिस दिन आप समझ जाएंगे बिहार समझ लेंगे. हमें आपकी ज़रूरत है आपके अपमान की नहीं. एक बटा २९ हिंदुस्तान मैं भी हूँ, मैं ही देश हूँ, मेरे लोग भी भारतीय हैं, मैं बिहारी हूँ, मैं बिहार हूँ.


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