मायावती का इस्तीफा यूपी में महागठबंधन की तैयारी तो नहीं

Nanhe Sipahi | Jul 19, 2017 02:07 AM


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अभी लोकसभा पूरी तरह गरम भले ही न हुई हो पर लगता है ये सत्र बहुत सारे रंग दिखाएगा. वैसे भी संसद राजनित का बड़ा मंच बन गया है. सन ९६ से जब से देश ने संसद का लाइव टेलीकास्ट घर से देखना शुरू किया है तब से संसद से ही देश की राजनित की गोटिया सजाई जाने लगी थी. याद कीजिये अटल जी का इस्तीफा, सुषमा की जोरदार तकरीर जब उन्होंने संयुक्त मार्चे की सरकार को चुनौती दी थी. याद कीजिये मनमोहन सिंह की नाटकीय ताजपोशी और याद कीजिये 2G और कोयला पर उबलते संसद को. मोदी का राहुल गाँधी को मनरेगा की विफलता का जवाब, JNU नारेबाजी और रोहित वेमुला केस पर स्मृति ईरानी का भाषण, यही तो हुआ देश की संसद में. अभी हाल ही में मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी, आरोप लगाया की संसद में उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया. अब संसद फिर से उबाल पर है. पूरा जोर है कि सरकार को कटघरे में लेकर बखिया उधेड़ी जाये. देश के संसद में चल रहे इस घटनाक्रम को समझना है तो हमें थोड़ा बाहर देखना होगा, समझना पड़ेगा की आखिर मायावती का इस्तीफा सच में देश को ये सन्देश देने के लिए था कि केंद्र की सरकार तानाशाह है या इसके पीछे राजनित की कहानी कुछ और ही है.

ढूह बनता बहुजन समाज और माया की तानाशाही 


कांसीराम की बहुजन राजनीति पर अगर किसी ने अपनी रोटियां सेंकी तो सही मामलो में वो मायावती ही है. देश को दलित राजनित की पहचान कराने वाली मायावती आज हाशिये पर है. २०१४ के आम चुनावो में लोकसभा में अपना प्रतिनिधित्व गवां चुकी माया हाल ही में सम्पन्न हुए उत्तरप्रदेश के विधानसभा के चुनाव में भी कुछ खास नहीं कर पायी. किसी ज़माने में किंग और किंग मेकर दोनों रही मायावती आज वज़ूद की लड़ाई लड़ रही है. किसी ज़माने में उत्तरप्रदेश के दलित वोटबैंक की इकलौती मालकिन मायावती को सबसे बड़ी चोट यही है कि उनके इस वोटबैंक का बटवारा हो गया है. बिहार के माय समीकरण के तर्ज़ पर यूपी में दलित और मुसलमानो का समीकरण बनाने के फ़िराक में माया ने अपना आधार ही खो दिया है.



मायावती की राजनीति के केंद्र में हमेशा दलित ही रहे हैं। दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों को लंबे वक्त तक मायावती के रूप में अपना एक प्रतिनिधि दिखता रहा। लेकिन जिस तरह से मायावती ने उत्तर प्रदेश की सत्ता में रहते हुए खुद के, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर, कांशीराम और हाथी के स्टैच्यू राज्यभर में लगवाए उससे वह आम जनता से कटती चली गईं। इसके अलावा उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी मायावती के कद को कम किया। जिस दलित की राजनीति मायावती करती रही हैं, वह कहीं पीछे छूट गया और मायावती के लिए दलित की नहीं दौलत की देवी जैसे शब्द इस्तेमाल होने लगे। कभी दलितों के वोट हासिल करने के लिए मायावती और उनके राजनीतिक गुरु कांशीराम ने 'तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' जैसे नारे दिए तो बाद में मायावती ने सर्व समाज को साथ जोड़ने के लिए 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है' और 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' जैसे नारे भी बुलंद किए। लेकिन मायावती से धीरे-धीरे दलित जनाधार खिसकता चला गया और अगड़ी जातियां मायावती के पुराने तेवरों के चलते कभी उन्हें अपना नहीं पायीं।

दुसरो पर तानाशाही का आरोप लगाने वाली माया पर भी तानाशाही के कई आरोप लगे. उनके मंत्रियो ने तो ये भी आरोप लगाया था की माया के सामने सारे मंत्री ज़मीन पर बैठते हैं. खुद मायावती ने राजीव शुक्ल को दिए एक इंटरव्यू में माना था की उनके मंत्री उनको बड़ी बहन मानते हैं इस लिए ज़मीन पर बैठते है. मायावती के एक मुस्लिममंत्री ने ये तक आरोप लगाया था की उन्हें पैर छूने को कहा गया और  इसी वजह से उन्होंने पार्टी छोड़ दी क्यों कि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता. मायावती को वो विवादस्पद इंटरव्यू आज तक यू ट्यूब पर उपलब्ध है. ऐसे में अगर तानाशाही का आरोप लगा कर मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देती है तो ये तो तय है कि दाल में कुछ तो कला है. वैसे भी कितनी दफा इससे पहले उनके टाइम ख़त्म होने पर उनको या दुसरो को रोका गया है. अगर ऐसा चलता रहा तो सारे सांसदों को एक एक कर इस्तीफा देना पड़ेगा 


दलित वोटों के लिए मायावती का मास्टर स्ट्रोक

मायावती का आरोप है कि यूपी में दलितों के खिलाफ अत्याचार हो रहा है। अगर वह इस मुद्दे को लेकर इस्तीफा दे देती हैं तो यह उनका मास्टर स्ट्रोक भी साबित हो सकता है। क्योंकि उनका कार्यकाल पूरा होने में अब करीब 9 महीने बचे हैं। अगर वह अपना कार्यकाल पूरा भी करती हैं तो उनके पास राज्य में इतने भी विधायक नहीं हैं कि वह दोबारा चुनकर संसद के उच्च सदन में पहुंच सकें। ऐसे में दलितों के खिलाफ अत्याचार के मुद्दे पर कुर्बानी देकर वह पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उनसे छिटके दलित वोटों को एक बार फिर से अपनी झोली में लाने की कोशिश कर सकती हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पायी थी, जबकि विधानसभा चुनाव में उसकी झोली में सिर्फ 19 सीटें आयीं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिहाज से मायावती अगर दलित वोटों को एकजुट करने के लिए इस्तीफे की अपनी बात पर कायम रहती हैं तो यह उनका मास्टर स्ट्रोक भी साबित हो सकता है। वैसे ये मास्टरस्ट्रोक भी तभी साबित हो सकता है, जब वह दलित समाज को यह समझाने में कामयाब रहीं कि उन्होंने उनके लिए कुर्बानी दी।



मायावती ने आरोप लगाया है कि उन्हें ज्वलंत विषयो पर बोलने से रोका गया और केंद्र तानाशाही भरा रुख अख्तियार कर रहा है, ऐसे में सरकार के विरोध स्वरुप वह इस्तीफा दे रहे हैं. मायावती को कांग्रेस का भी समर्थन मिला है मतलब साफ़ है कांग्रेस बसपा में नया साथी ढूंढ रही है. ये अचरज की बात नहीं होगी अगर भाजपा का रोकने के लिए कांग्रेस बिहार की तर्ज़ पर यूपी में भी महागठबंधन बनाने की कोशिश करे. वैसे हमें मायावती के इस्तीफा की वजहों को तलाशने में ज्यादा दिलचस्पी है. अभी वर्तमान के गणित के आधार पर तो मायावती के सदन में लौटने की संभावना कम ही दिखती है. जहा तक हम उम्मीद कर रही हैं कांग्रेस के सहयोग से मायावती फिर से राज्यसभा में कदम रखेगी और ये कदम ही यूपी को महागठबंधन की ओर ले जाएगा.


वैसे भी मायावती इनदिनों हताशा के नए दौर में है. आपको याद दिलाते चले की EMV का वो मुद्दा जिसे आम आदमी पार्टी ने बढे जोर शोर से उछाला था उसका सृजन मायावती ने ही किया था. अपनी हार को EVM  के पीछे छिपाने की उनकी कोशिश हालाँकि नाकाम ही रही थी उलटे उन्होंने देश को गलत सन्देश दिया, अगर वो अपनी पराजय स्वीकार कर लेती तो शायद जनता में उनकी थोड़ी बहुत साख बची रह जाती. 


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