वो २ भाई - एक पाकिस्तान की तरफ से लड़ा और एक हिंदुस्तान की तरफ से

Nanhe Sipahi | Aug 15, 2017 08:08 PM


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आज हम आपको एक ऐसे हक़ीक़त से रूबरू करने जा रहे हैं जो आज़ादी के चकाचौंध के बीच भुला दी गयी बटवारे के दर्द से जुडी है, ऐसे भाइयो की कहानी जो बटवारे में अलग हुए और अपने अपने देशो की सेनाओ से लड़े. ये ऐसे दो ऑफिसरों की कहानी है जो आज़ादी के बाद अपने अपने देश चुनने के लिए स्वतंत्र हुए. बड़े भाई ने अपने पिता के साथ पाकिस्तान जाना उचित समझा और छोटे  का लगाओ उसकी मातृभूमि से रहा और उसने भारत को चुना अपनी मातृभूमि के रूप में. ये कहानी है याकूब खान और यूनुस खान की.

आजादी के पहले से ही ये दो भाई सेना में थे और जब बटवारा हुआ तो बड़े भाई मेजर याकूब खान ने पाकिस्तान का रास्ता पकड़ा, क्यों की ये भाई पहले से ही सेना में थे तो पाकिस्तान की नयी सेना ने मेजर याकूब खान को उनकी सेवाओं के लिए सेना में रख लिया. वही छोटे भाई यूनुस खान ने भारतीय सेना के अधिकारी के रूप में अपना काम जारी रखा.



विभाजन की जो सबसे जटिल प्रक्रिया थी थी सेना का बंटवारा, इस विभाजन के साथ साथ २ भाइयो का भी बटवारा हुआ, उन भाइयो का जिहोने बचपन से कंधे से कन्धा मिला कर एक दूसरे को सहयोग किया यहाँ तक की वर्मा और उत्तरी अफ्रीका में भी साथ साथ संघर्ष किया. पर जब बटवारे का समय आया तो अन्य मुस्लमान सैनिको की तरह बड़े भाई ने पाकिस्तान जाने का निर्णय लिया. CR Gopalachari बताते है कि इसके पीछे सोच ये थी की धीरे धीरे ये मामला ठंढा पड़ता जाएगा और हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सेना कभी एक दूसरे के सामने नहीं आएगी, CR Gopalachari बताते हैं की भारतीय सेना द्वारा अपने पाकिस्तानी भाइयो के लिए आखिरी पार्टी रखी गयी थी जहा द्वितीए विश्वयुद्ध के कहानियो पर चर्चाएं हो रही थी कहानिया सुनाई जा रही थी, गले मिलने का दौर चल रहा था, आँखों में पानी भर कर एक दूसरे को विदाई दी जा रही थी. इसी तरह के दृश्य लाहौर, कराची और रावलपिंडी में भी देखे गए थे, जहां मुस्लिम अफसरों ने अपने हिंदू, मुस्लिम और सिख अधिकारियों को अपने विदाई दी थी। यहां भी उच्च भावना थी और पोलो ग्राउंड पर या क्रिकेट क्षेत्र में मुलाकात का वादा किया था।



जैसे वादे किये गए थे वैसा कुछ हुआ नहीं, समय का चक्र घुमा और लगभग साल भर बाद ही भारत और पाकिस्तान की फौजें एक दूसरे के सामने थी. ये दोनों भाई भी एक दूसरे के खिलाफ युद्ध में थे, अपने अपने राष्ट्र के लिए प्रेम, समर्पण और देश की ड्यूटी से इससे बड़ी मिसाल मिलना लगभग नामुमकिन है. बड़े भाई याकूब खान अपने पाकिस्तानी फौजियों की कमांड कर रहे थे. पाकिस्तान की इस टुकड़ी ने बर्फ से ढके एक पहाड़ पर हमला किया किस्मत का फेर देखिये छोटे भाई यूनुस भी उसी बर्फ के पहाड़ की सुरक्षा में देश के लिए कार्यरत थे, एक भयंकर लड़ाई के बाद छोटे भाई यूनुस खान ने वीरगति प्राप्त की. क्या साहस, कर्तव्य और देशभक्ति की भावना का बेहतर अनुकरणीय उदाहरण किसी के पास होगा.

वैसे देश के प्रेम का जज्बा इन दोनों भाइयो को विरासत में मिली थी. इनके दादा ने भी १८५७ में अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़े गए पहली लड़ाई में भारतीयों का नेतृत्वा किया था.इस अनोखी कहानी का जिक्र "फ्रीडम एट मिडनाइट" नाम की एक किताब में भी किया गया है, जो Larry Collins and Dominique Lapierre ने लिखी थी.


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