बाबाओ के चंगुल में फंसा देश

Nanhe Sipahi | Aug 29, 2017 06:08 PM


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जब आज मुल्लो, मौलवियों, गुरुओ और बाबाओ के चंगुलों में दबी मानवता सुबक रही है और भारत की असली पहचान धूमिल हो रही है तब खास तौर पर हमें ये सोचना पड़ेगा की देश इस दिशा में आखिर क्यों गया. क्यों रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, बुद्ध, महावीर और अन्य संतो से दूर खड़ा भारत पाखंड और आडम्बर को ही धर्म समझने लगा है. क्यों देश ने ऐसे विद्वानों के ऊपर पाखंड को तरजीह दी है और क्यों जब भी किसी ऐसे बाबाओ का अपराध देश के सामने आता है तो देश में उसकी स्वीकारोक्ति नहीं होती.
 
अगर मैं आपको ये कहूं कि देश में बढ़ रहे इस दूसरे प्रकार के पाखंड के पीछे भी राजनीतिक इच्छा शक्ति है तो हो सकता है कि आपको ये बात बुरी लगे पर हक़ीक़त ये है कि यही हकीकत है. अपने राजनैतिक फायदे के लिए ऐसे पाखंड को बढ़वा दिया जाता है, इन्हे पावर हाउस बनने दिया जाता है, ऐसे लोगो को बढ़वा दिया जाता जो चुनावो में भक्तो को वोटबैंक बना कर परोस सकें. धर्म के नाम पर आपके और हमारी भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है और दुःख की बात ये है की हम ऐसा होने देते हैं. हम इस मकड़जाल में उलझे है और निकलना नहीं चाहते. आप खुद ही सोचिये की अगर धर्म के गुंडों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त न होता तो क्या देश की सेना देश की जनता पर गोलियां चला रही होती? ऐसे परिस्थिति आ कैसे गयी, या यूँ पूछिए की बनने कैसे दी गयी. एक मुकद्दमा जिसमें एक मुज़रिम को सजा सुनाने में १५ साल लग गए और हाई-कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रास्ता अभी भी बाकि है, सजा सुनाने के लिए जज को हेलीकाप्टर से जेल भेजा जा रहा है, हाई कोर्ट प्रदेश की सरकार पर टिप्पणियां कर रहा है, ये हो क्या रहा है. सरकार गुंडों के आगे नतमस्तक ही तो दिख रही है. सच मानिये भारत ये नहीं था, भारत ये कभी नहीं था.




 
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली में दामिनी लूटी थी. ऐसा लग रहा था जैसी पूरा देश उबाल रहा है, सबको न्याय चाहिए था, देश में बहुत गुस्सा था, कानून के प्रति, न्यायव्यवस्था के प्रति. एक कठोर कानून बनाने की मांग उठ रहे ही, लोग फेसबुक पर अपनी डीपी बदल रहे थे. सड़को पर नारे लगाए जा रहे थे. मोमबत्तियां जलाई जा रही थी, दुःख की बात ये है कि अब जबकि ऐसे ही दूसरे मामले में एक व्यक्ति को १५ साल के ट्रायल के बाद सजा सुनाई जा रही थी तो हम देश जला रहे थे. तब हमारे अंदर निराशा थी की न्याय नहीं मिला, अब गुस्सा है की न्याय कैसे मिल गया. अजीब ही तो देश है हमारा. क्यों कि जिस व्यक्ति को सजा सुनाई जा रही है वो एक धर्म गुरु है इसका अर्थ ये तो नहीं की वो इस देश की न्याय व्यवस्था से ऊपर है, ऐसा भी नहीं है की हमारे देश में बाबाओ को कुछ भी करने का लाइसेंस प्राप्त है. हमारा देश रोता रहता है की किसी बड़े व्यक्ति को सजा नहीं मिलती, आज जब न्यायालय न्याय व्यवस्था के नए मूल्य स्थापित कर रही है तो हम उसे पचा नहीं पा रहा है. हमारा हाजमा खराब है.




मानवजाति को बड़े बड़े उपदेश देने वाला भारत अगर इस दोराहे पर खड़ा है तो निश्चित ही इसके कारण विशेष होंगे. मुझे पता है और आपको भी, बस मैं हिम्मत जुटा पा रहा हूँ उसे कहने की अगर आपके अंदर हिम्मत है तो सुन भी लीजिये. सच ये है की हम आलसी लोग है, डरे हुए लोग है, हमें धर्म के नाम पर डराया गया है, हमें ये बताया गया है कि इतने पैसे धर्म गुरुओ को दान करेंगे तो गरीबी दूर हो जाएगी. हमें ये नहीं बताया गया की गरीबी पैसे देने से नहीं, पैसे कमाने से दूर होती है. पर हमें उससे फर्क नहीं पड़ता, तो क्या हुआ अगर एक गुरु की दुकान बंद हो गयी, हम दूसरी शुरू कर लेंगे. हम देश की राजनैतिक शक्तियों को कोसते रहते है की परिवारवाद है पर क्यों धर्म के मामले में हम चुप हो जाते है, अगर एक बार ये मान भी लिया जाये की जिन संतों को सजाये सुनाई गयी वो भगवन के दूत है पर मुझे ये समझाइये की उनके पुत्र कैसे भगवन के दूत बन गए वो भी रातो रात. ये कैसा तपस्य है की बाबाओ के पास हज़ारो करोड़ की सम्पति है और ये भी समझाइये की इस संपत्ति का भोग करने वाला व्यक्ति संत  कैसे हो गया?
 
देश को तो शर्म आनी चाहिए थी की एक महिला की लूट होती है और उसे न्याय मिलने में १५ साल लग जाते हैं, इन १५ सालो में उस साधवी के भाई की हत्या कर दी जाती है और उसपर तरह तरह के दवाब बनाये जाते हैं, इन दवाबो के बाद भी अगर संघर्ष को अंजाम मिलता है तो देश को देश को खुशियां माननी चाहिए थीं. 


हमारे देश के सनातन इतिहास में कभी किसी महिला पर हुए अपराध को देश ने उचित नहीं समझा फिर इस मामले में हमने ऐसा व्यव्हार कैसे कर दिया, विश्व को क्या संकेत दिया सोचिये. 
देश को खुशियां माननी चाहिए थी कि १५ साल के बाद ही सही धर्म कि जीत तो हुई, धर्म के नाम पर एक नाबालिग का बलात्कार होता, दूसरी साध्वी का बलात्कार होता है, देश कि न्यायव्यवस्था एक व्यक्ति को दोषी पाती है और उसे २० साल का सश्रम कारावास कि सजा सुना देती है, बस इतना ही, इससे आगे कुछ नहीं. अगर व्यक्ति अपराधी है तो अपराधी है. कोई बाबा नहीं और उसके लोग अगर दुसरो कि संपत्ति को नुकसान पहुंचते है, आगज़नी में और हिंसा में तो वो गुंडे है कोई भक्त नहीं. सोच के देखिये की जो अपराधी है उसे फाइव स्टार जैसी सुविधाएं देकर सुलाया गया और जिन लोगो ने आगज़नी करके खुद को अपराधी बनाया उनमें ३० से ज्यादा लोग समशान में सोये, ये देश का दुर्भाग्य ही तो है. मुझे लगता है कि देश को अपनी उन्ही सनातन परम्पराओ की की तरफ लौट जाना चाहिए. नहीं तो हम ऐसी ही कई और दुकाने खुलने देंगे. ऐसे ही इन दुकानों को अधर्म का पनाहगार बनने देंगे. अगर दयानन्द सरस्वती ये कहते हैं की वेदो की ओर लौटो तो इसके मायने हमें समझने की जरुरत है. जरुरत है पुनर्निर्माण की ताकि हम आडम्बरो के मायाजाल से बहार आ सकें. 


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